वनवासी का राज्याभिषेक और चतुर्वर्ण की नई परिभाषा
जय बगलामुखी ठाकुरजी । अरे गिलगामेश कैसे आना हुआ यहा, सब ठीक तो है। जी कोई महाराज मिले थे बोले आपको मिल के आगे अपने गंतव्य को प्रारंभ करू। ठीक है तो बसा दिया हमारे वनवासी को उसके राज्य में क्या कर रहा है वो अभी । वो तो अभी के लिए अपने शहर के इतिहास और वर्तमान स्थिति के सहसंबंध से व्यवस्था की पुनर्रचना कर रहा है । क्या वो महाराज जी के साथ गया है अभी अपने राज्य से दूर हा वो महासेन से मिलने गया है। ठीक है और वो तुम्हे अब बहुत वर्षों बाद मिलेंगे , ऐसा लगता है । हा वो महाराज भी यही कह रहे थे की आपसे मिले आगे हिंगलज माता के दरबार से मुझे तुर्की और वरका जाना है। और मुरुगा तुम्हे कहा मिलेगा , चंद्रशेखर तुम्हे कहा मिलेगा और तुम्हे एक एक इंच के लिए कुछ दिन भी लग सकते हैं गिलगामेश । मुझे लगा जैसे में एक हफ्ते में जाकर फिर अपने गांव वापस आ जाऊंगा । अच्छा मजाक कर लेते हो, तुम्हे घूमने नही हर वनवासी को राज्याभिषेक करते हुए जाना है और आखिर में अपनी ऋषि होने के गंतव्य को पूरा करना है । तो बताओ योगेश्वर को स्थानीय स्वराज संस्था के पीठ पर आसीन करने के समय तुमने क्या सीखा । मुझे कुछ सीखना भी था क्या ...