क्षात्रधर्म के अर्वाचीन नियम
गिलगमेश जब मेने तुम्हे अपने बारे में बताया कि मेरे घर के और गांव के कलेश से दूर रहना ही बेहतर होगा इसलिए में यहां तक पहुंचा हु , तो तुम क्या सोचते हो उसके बारे में ।
में बहुत सोच सोच के थक चुका था योगेश्वर ठीक है जो कुछ स्मृति से श्रुति में आए वो तुम्हे मेरे वाणी से मिलेगा और पता नही अब जब में तुम्हे बताऊंगा तो उस में क्या बदलाव होंगे लेकिन याद रहे
दो मौसेरे भाई अगर लड़ रहे हो तो तुम्हे वहा चुप रहने में तुम्हारी भलाई है ।
बात समझ नही आई, कोई example ?
ठीक है मानले तेरे गांव के पास एक धनी व्यक्ति ने अपने दो लड़कियों को सिखा कर काबिल बनाया की वो बिना किसी सहायता से अपना जीवन व्यतीत करे , पर जीवन बिना मोह के नही चलता ,
तो एक लड़की एक मुस्लिम व्यापारी से मोहित हो गई और इस धनी व्यक्ति को उसे दामाद बनाना पड़ा।
दूसरी लड़की ने उच्चशीक्षा विभूषित पति पाया जो किसी शहर में नौकरी करता था और कायदे कानून का शिक्षक था ।
अब उन दोनो के बालक इस धनी व्यक्ति के घर आए और एक आम के पेड़ से आम तोड़ते वक्त उनका झगड़ा चालू हुआ अब बोलो तुम किसका साथ दोगे ।
में तो दोनो के झगड़े का मजा लूंगा गिलागमेश!!!
Exactly क्षात्र धरम यही कहता है की दूसरे के घर के कलेश उसीके घर में रहे तो ही तुम तुम्हारे घर सुरक्षित हो । इसीलिए बनियों का देश USA कभी नहीं चाहेगा की उसके भूमि पर कोई भी युद्ध हो। वो हिरोशिमा और नागासाकी का पुनरोत्थान करेगा अगर वो नोबत आई तो।
बहुत आगे निकल जाते हो आप में सिर्फ आम के पेड़ तक ठीक हु , अब समझ गया।
एक घर में कलेश कभी धर्म या जाति के नाम पर नही हो सकता पर जर जमीन और जोरू के लिए हो सकता है।
इसमें कुछ गहराई नही है पिछले वाक्य जैचल सी।
जैसा मेने सोचा था , ना तुम समझे ना तुम ने जहा ध्यान देना था वहा दिया ।
ध्यान धर्म या जाति पे नही जरreal इस्टेट जमीन और जोरू पे देना है बालक।
बोलो गुरुजी , example
एक गांव में सभी ठाकुर है तो अब बताओ बड़ा छोटा कैसे होगा।
उम्र के हिसाब से , जायदाद के हिसाब से
गांव से हो ज्यादा देर नहीं लगी उसी को जमीन , और जर कहते है जमीन स्थावर है और जर जंगम,
वो क्या होता है (रियल एस्टेट और चल संपत्ति), ओके,
तुम्हारा तो हिंदी का problem नही होना चाइए बालक,
ठीक है गांव छूटा है तो भाषा भी थोड़ी फीकी हुई है।
जब बड़ा भाई होगा तो बड़ी जायदाद होती है घर की बड़ी भाभी मां जाने के बाद मां ही होती है, मतलब अगर तुम कुवारे हो और तुम्हारी पीढ़ी बनते बनते अगली जनरेशन 18 की हो तो तुम्हे एक की बाद का सम्मान काम मिलेगा , वहा चालू होता गृह युद्ध जिसे इधर काका पुतन्याच भांडन कहते है महाराष्ट्र में । वो तो पुराने समय से आया है अंगद और सुग्रीव के संबंध और मेघनाद और विभीषण के संबंध एक जैसे ही रहे होंगे ।
मगर बड़ा भाई तो दाता होता है ।
मुझे लगा ही था आप सतयुग से हो अरे भाई ये त्रेतायुग से ऐसे ही है , भाई तब तक दाता होता है जब तक तु उससे ऊपर न जाए , जब तू उसे सर के ऊपर चढ़ के मूतने वाला लगे तो वो हवा से ही तुझे जमीन पे गिरा देगा ।
ठीक है पर जर जमीन जोरू ये तो सब के पास होगे फिर भी अपने आप कम कोनसा ठाकुर मानेगा,
में हीरो नही ये तो समझ जाओगे मेरा साइड हीरो हु क्योंकि की मेरे संसाधन मेरे चाचा के लड़के से कम है ये ज्ञान तुझे उस वक्त मिलना चाइए था जब तू गांव में था तेरे ऊपर बात कर रहा हु में । तू भी एक गांव का मुखिया बनना चाहता था ना क्या हुआ आगे।
ऐसा हिलाते मत जाओ जिंदा आदमी की जलन और प्रतिशोध को बढ़ावा मिल जाता है।
बुरा लगा , लेकिन ध्यान रख ये बात , जर, जमीन और जोरू ये संसाधन दुनिया को तेरा अस्तित्व बताते है , अभी शादी की उम्र में कितने साल है , 5 साल तो होंगे ही ,
गांव से हो ,बूढ़ा माना जायेगा तुमको 5 साल बाद।
आया तो ही शहर में।
ठाकुरजी भी जानते है कोनसा गांव का लड़का फिर वापस गांव नही जाता?
उन्होंने दो लोग तो दिखा दिए , खैर अभी भरोसा रखता हु तुझपे।
ठीक है आगे
योगदर्शन के अनुसार अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश पाँच क्लेश हैं।
अगर तुम सचमे खुद को अनस्टेबल मानते हो तोही योग गुरुसे मिलना वरना अभी बस ये पांच नाम याद रखना ।
क्या इनका जप करना है क्या ।
अरे कलेश नाम से क्या समझा योगेश्वर , अविद्या ही इसका कारण है मतलब तुम्हे पता नही कलेश क्या होता है??
मैं तो मजाक कर रहा था अविद्य मतलब विद्या का अभाव , अस्मिता मतलब अहंकार, राग मतलब अभी जो तुम्हे मुझे देख कर उत्पन्न हो रहा वो भाव, द्वेष मतलब अगर छोटा भाई आगे बढे तो बडे के मन में जो उत्पन्न हो वो भाव ,
अभिनिवेश का मतलब क्या होता है ?
जो सब को होता है , जंगल में हिरण को , खेतो में भेड़ों को, और हम तुम को ये शहर और गांव की भीड़ को ,
मृत्यु का भय।
और जिसे वो भी न हो वो क्या करता है, वो या तो योगी चिरंजीवी बनता है या असुर राक्षस,
असुर राक्षस को बड़ी specific तरीके से , काल, समय और स्थान पर मृत्यु प्राप्त होती हैं उसकी की इच्छा के अनुसार।
तो इसका क्षत्रधर्म से क्या संबंध।
वही जो राम और कृष्ण का है ।
पांचों कलेश हर समय तुम्हारे साथ होते है पर कभी वो हो तो तुम पर हावी होंगे जब तुम्हे नमन और विवेक से काम लेना है लेकिन जब तुम उन पर हावी हो तब उनका शमन और दहन करने में ही भलाई है।
अगर तुम परिस्थिति को उस समय बदलना चाहो जब तुम कमजोर हो तो लोग कहेंगे तुम परिस्थिति से हार गए, तुम परिस्थिति को हात में होते हुए भी कुछ न करो तो ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी के लोग कहेंगे इसने खुद पर ये समय लाया है।
दोनो में तुम हार चुके हो , पहला भाव सहानुभूति है और दूसरा भाव विश्लेषक निंदा का है।
असुर दूसरे भाव से फलित होते है पर उनके कर्म उन्हे मोक्ष तो देते है।
पहला भाव ओह लोक में सहिनभूत करता है लेकिन आगे मरने के बाद वंशो में नाम खराब होता है।
फिर क्या करे।
कर्म और कांड में इतना फर्क है की कर्म सफल होते है और कांड पता चले तो विफल हो जाते है ।
अपनो को कांड से गिराने में व्यक्ति अपने किए अच्छे कर्म भूल जाता है और फिर असुर बनता है
अभी आखिरी पड़ाव
ये क्षेत्र और धर्म की लड़ाई में, क्षत्रिय को हमेशा क्षेत्र पहले रखना है और धर्म को बाद में , क्योंकि झुकना ये वेलो का धर्म है पर एक बड़े पेड़ की रसद उसके क्षेत्र में जाके रोकने वाले यही वेल होते है इसलिए किसी ऐसे कमजोर व्यक्ति को बढ़ावा न दे जो तुम्हारे कार्यक्षेत्र को दगाबाजी से हड़प ले।
पर वहा क्या करना है फिर असुरों का अनुमान लगाना आया तो देवो का कार्य भी देख लो बालक।
पहले तो तुम बड़े हो ये उसे पता है तो इसके सामने इंद्रजाल बुनो जो वो तुम्हारे लिए कभी हानि का कारण ना बने।
छल तो यदुवंशी को शुक्राचार्य पुत्री देवयानी से मिला है । असुरराज होने के बावजूद जगन्नाथ कहलाते है ये शब्दजाल के रचयिता योगेश्वर ।
मेरा नाम इतना महान है आज पता चला पर उससे क्या होता है ।
सभी लांछन से मुक्त होते हो तुम और कोई भी पाप करने पर भी लोग नटखट बोल के छोड़ देते है । तुम्हारे सभी कांड को लीला बोलते है। पर ध्यान रहे कार्यक्षेत्र और धर्म कर्तव्य इसमें युद्ध समय में कार्यक्षेत्र की रक्षा करो ।
और जब युद्ध न हो तो ।
तो राम बनो कर्तव्य का पालन प्रजा के हित में करो।
तो सतयुग में क्या और कलयुग में क्या।
क्षत्रधर्म कर्म मार्ग है राजन जो युद्ध की कला का फलित है , ज्ञान मार्ग सतयुग का मार्ग है जो ज्यादातर आश्रम और अरण्यो मठ, मंदिर में जिंदा रहेगा ,
तीर्थ और धाम बाल्यावस्था तथा भक्ति मार्ग को दर्शाता है।
और कलयुग में लड़ाई में से है ।
अहंकार से लड़ाई कोई असुर नही जीता और कोई देव असुरो के भय से मुक्त नही , युद्ध तब तक नहीं होता जब तक अस्मिता को ठेस पहुंचे।
दोनो तुम्हारे अंदर है , उपयोग योग्यता से करना ।
कहा से शुरू किया था और कहा लेके आए हो ।
इसे रैंडम एक्सेस मेमोरी यानी श्रुति कहते है बालक।
बदलाव तो बहुत हुए लेकिन सार यही है के
खतरे में खत्री को याद किया जाता है और खेती में किसान को तो ध्यान रहे ।
Farmer in peace & warrior in war ।
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