धर्म के 4 पैर

पर क्यों ठाकुरजी आपने खाना ही क्यों खिलाया उस बूढ़ी औरत को वो तो भीक मांग रही थी।

दान उसी चीज का करना चाहिए योगेश्वर जो चीजे तुम सच में बाट सकते हो , तुम्हें तो पता पैसा कब बाटा जाता है और बाटने वाला वहा दाता और याचक दोनो होता है।
और एक बात मेरे जीवन मे मेने पाया की मैं जब भी पैसे के मामले में मात खा कर किसी से उम्मीद लेके जाता उस घर में मुझे बस खाना मिले मुझे दूसरे दिन अपना मार्ग दिखता, बस उस समय से आज तक और आगे भी में ये सोचता हूं की को चीजे दान में दी जाए वो व्यक्ती की मूलभूत आवश्यकताओं में से हो तो वो व्यक्ती ऋण से मुक्त रहेगा, अन्न, और वस्त्र ऐसी चीजे है जो एक व्यक्ती ऋण से दूसरे व्यक्ति को देके निकल जा सकता है।
रही बात निवारा यानी आश्रय की तो आश्रय भी कुछ समय सीमा से बंधा होता है।
जब महाबली ने भी दान दिया तो वामन ने द्वारपाल बन के उसका ऋण चुकाया ।
दान का भी ऋण होता है योगेश्वर आशा करता हूं तुम समझ गए।
कुछ कुछ ठाकुरजी।
ठीक है अब दान की महिमा फिर आगे सुनने से पहले ये जानलो की धर्म के 4 पैरो में से एक है दान बाकी तीन है सत्य ,तप और दया, ये तीनो भाव से पूर्ण दान ही जल्द लेने वाले को ऋण मुक्त करता है।
तो दान एक धर्म कार्य है और लेने वाले को ऋण मुक्त होने के लिए वो मूलभूत आवश्यकता होगी तो उत्तम, आश्रय का दान समय सीमा में हो , 
परंतु ठाकुरजी ज्ञान के दान के ऋण से मुक्त कैसे होगा कोई ?
ये अतिरिक्त विषय है पर ठीक है, ये बताओ तुम कभी वो हार्ड डिस्क use किए हो,
 हा बिलकुल 
तो बताओ कितना वजन बढ़ता है जो पूरी भरी हार्ड डिस्क हो उसका।
चेक नही किया ठाकुरजी पर कुछ भी नहीं बढ़ेगा।
एकदम सही, इसी तरह जैसे वो ट्रांजिस्टर से बने रास्ते बंद या चालू होने से एक दृश्य स्वरूप या माहिती स्वरूप तुम्हे समझ आए वो भाषा में जो संकलित रहते हुए भी वजन की मात्रा न बढ़ाता न घटाता वो ज्ञान आए दान की श्रेणी में तो ठीक पर वो कर्तव्य में भी आता है यानी वो ऐच्छिक न होकर आवश्यक हो जाता है तो वह दान भी है और ऋणी का आगे बढाने का कर्तव्य भी ।
एक और बात यहां में जोड़ते चलूं योगेश्वर।
कोई भी धर्मात्मा ने प्रथम ज्ञान मौखिक स्वरूप में ही दिया है और उसके बाद उसे अमौखिक लिखित या अलिखित में प्रक्षेपित किया गया है।
ये तुम्हारे लिए पीएचडी का विषय हो सकता है लेकिन ब्रम्हा से लेके कृष्णा तक सब ने प्रथम ज्ञान मौखिक रूप से ही दिया और याचक ने प्राप्त किया, आज के जमाने में भी लोग गायकों ने गाए हुए गाने याद रखते हैं क्यों की वह मौखिक रूप है और वह एक नाद में है।
भगवान की आरती मंदिर के गर्भ में मंदिर में पूजा करते समय गाने के लिए बनी है वही मौखिक रूप वही नाद।
और ऋषि परंपरा को याद करे तो आरण्यक और उपनिषद में हर जगह ऋषि अपने शिष्य को ये बात दृढ़ता से बता रहा है की जो मेने मेरे गुरु से पढ़ा वो में तुम्हे जस का तस बताने का प्रयास कर रहा हु जैसे कोई साइंटिस्ट अपने institute मे अपने जूनियर्स को बताए वैसे ही ।
आशा करता हु की तुम्हे भी ये ज्ञान जो मिला है तुम इसको प्रक्षेपित कर के उसका कर्तव्य निभाओगे।

जी ठाकुरजी में पूरी तरह से दान और ज्ञान के साथ धर्म के 4 पैर और ज्ञान का मौखिक रूप से प्रसारण की बात जा के ता प्रक्षेपित करने का प्रयास करूंगा।

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