वनवासी का राज्याभिषेक और चतुर्वर्ण की नई परिभाषा

जय बगलामुखी ठाकुरजी ।
अरे गिलगामेश कैसे आना हुआ यहा, सब ठीक तो है।
जी कोई महाराज मिले थे बोले आपको मिल के आगे अपने गंतव्य को प्रारंभ करू।
ठीक है तो बसा दिया हमारे वनवासी को उसके राज्य में क्या कर रहा है वो अभी ।
वो तो अभी के लिए अपने शहर के इतिहास और वर्तमान स्थिति के सहसंबंध से व्यवस्था की पुनर्रचना कर रहा है ।
क्या वो महाराज जी के साथ गया है अभी अपने राज्य से दूर हा वो महासेन से मिलने गया है।
ठीक है और वो तुम्हे अब बहुत वर्षों बाद मिलेंगे , ऐसा लगता है ।
हा वो महाराज भी यही कह रहे थे की आपसे मिले आगे हिंगलज माता के दरबार से मुझे तुर्की और वरका जाना है।
और मुरुगा तुम्हे कहा मिलेगा , चंद्रशेखर तुम्हे कहा मिलेगा और तुम्हे एक एक इंच के लिए कुछ दिन भी लग सकते हैं गिलगामेश ।
मुझे लगा जैसे में एक हफ्ते में जाकर फिर अपने गांव वापस आ जाऊंगा ।
अच्छा मजाक कर लेते हो, तुम्हे घूमने नही हर वनवासी को राज्याभिषेक करते हुए जाना है और आखिर में अपनी ऋषि होने के गंतव्य को पूरा करना है ।
तो बताओ योगेश्वर को स्थानीय स्वराज संस्था  के पीठ पर आसीन करने के समय तुमने क्या सीखा ।
मुझे कुछ सीखना भी था क्या मुझे लगा में बस उसका सारथी हू और उसका सल्लागार।
ठीक है तुम अकेले ये पूरी जीत अपने संघ के बिना नहीं कर पाओगे ये तो मानते हो ना।
वो महाराज जी ने बताया था कि कोई वैष्णव होगा जो मेरा शिष्य बनेगा जो कबीर जी का अनुमान होगा ।
तो रामानंद बनाना है तुझे मुझे लगा तू सम्राट बनने के लिए तुझे कुछ युद्धकला में शामिल होना पड़ेगा पर रामानंद महाराज  ने खुद तुझे रामानंद बनाया है।
कोण रामानंद ?
अभी तो तुम यहां जिनके कहने पे आया है वो रामानंद थे ये जान लो बाकी तुम्हारे प्रवास में तुम्हे कोण रामानंद कोण कबीर , कोण नाथ ये सब पता चलेगा  ।
ठीक है ठाकुर जी अभी मुझे कहा जाना चाहिए।
अपने मां बाप से मिलके आए हो यहां या सीधा यहां आए हो ।
सीधा यहां आया हूं ठाकुरजी।
ठीक किया , कोई भी जल्दी नहीं अभी उम्र क्या है तुम्हारी ?
जी 35 को कुछ महीने कम होंगे ठाकुरजी।
मां बाप से मिल के कुछ वक्त गुजार के , चंद्रशेखर को 
या तो लखुंदर नदी के किनारे ही बुला लो या सोमनाथ चले जाना वो तुम्हे वहा मिलेगा।
फिर आगे की रणनीति पर वही बात कर सकता हैं।
याद रहे वनवासी को राज्याभिषेक कराने के लिए पहले उसे पहचानना जरूरी होगा कैसे पहचानेंगे???
नही पता ठाकुरजी कृपया बताए।
इसके लिए तुम्हें नया जगत समझना होगा, कही भी जाओगे अभी तुम चतुर्वर्ण को नही पहचान पाओगे क्योंकि ये स्थिति पहले भी  जब हॉस्टल के जगह गुरकुल का निवासी आश्रम होता था, जहा तुम्हे विनती करने पर और योग्य नियत जानकर हर एक साधक का वर्ण , जाति आधारित ( जन्म ) , तथा धर्म आधारित (व्यवसाय, कौशल्य) , मिल जायेगा ।
क्योंकि अगर तुम्हे तुम्हारे राम और युधिष्ठिर गुरकुलों में न मिले तो और एक जानकारी रखना की आजकल किराए के मकान में राजा अपने सारथी या अपने पुराने साथी के घर रहेगा तो उसका वर्ण समझने में हमसे गलती हो सकती हैं। इसलिये आवश्यक ये होगा के तुम अपने सूची में ये सब जांचबिंदु रखना।
अब चतुवर्ण की बात करते है, जैसे मेने पहले कभी बोला होगा । में या तुम चतुर्वर्ण का हिस्सा ही नही है क्योंकि आजभी 4 क्लास है सरकारी कर्मचारी होनेके और तुम या में इस व्यवस्था का हिस्सा ही नही है ।
ऐसेही हमारा राजनायक भी उस वर्ण व्यवस्था का हिस्सा नहीं होगा भले ही उसकी क्षमता पूरी व्यवस्था को चलाने की हो ।
आगे ये ध्यान रखो , ये तुम्हें समझ गया हो पर ध्यान न दिया हो तुमने आज वकील , पत्रकार, कलाकार, वैद्य ये ब्राम्हण है।
मंत्री , विधायक, सरकार, सेना  ये क्षत्रिय है।
कृषि को पकड़कर बाकी सर्व प्रकार के उद्योग चलाने वाले वैश्य है और वहा नौकरी करने वाले को शुद्र मान लेते हैं तो अभी बताओ तुम कोण हो??
अगर में आप जैसे नौकरी करूंगा तो शुद्र ही कहलाऊंगा ठाकुरजी, अगर में गुरुकुल चलाऊंगा तब में वैश्य बनूंगा, अगर में गलती से भी सरकार का हिस्सा बना तो क्षत्रिय और अगर किसी कारण वश में आप जैसा चाहते हो की हर वनवासी राजनायक की राज्याभिषेक तक या आगे सहायता कर सका तब में ब्राम्हण कहा जा सकता हु ।

नही गिलगामेश और एक उदाहरण से समझो वे गायत्री मंत्र रचयिता विश्वामित्र भी अगर आज होते और ब्रम्हा को जैसे राष्ट्रपति मानो तो जैसे वशिष्ठ के बिना उन्हें ब्रमहर्षी पद न मिला 
वैसे ही राष्ट्रपति तुम्हे देश का कोई भूषण पद तुम्हे दे सकते हैं 
पर तुम्हे बिना पैसे के अगर पूरे विश्व के एक चतुर्थांश हिस्से को भी अपने विचारशैली को मानने वालो के साथ राजनायको को राजा की उपाधि दिलवानी है तो तुम्हे विशेष ज्ञान को प्राप्त कर एक ऐसा शिष्य साथ होना चाहिए जो तुम्हारे योजनाओ को तुम्हारे बाद भी जारी रखे ।
सिर्फ एक चतुर्थांश ही क्यों ठाकुरजी पूरी विश्व की व्यवस्था क्यों नही ।
क्यों हर एक स्थान का चाल चलन अलग है गिलगामेश तुम्हे यूनान तक का दिगपाल बनना है, पूर्व में चीन यक्ष गंधर्व की भूमि है जहा उत्तम के मृत्यु के बाद ध्रुव ने आक्रमण किया पर शिव जी ने यक्षों की सहायता की ।
ऊपर रशिया मानो इंद्र की भूमि है जब भी कोई मनुष्य 100 यज्ञ करते थे इंद्र विघन उत्पन करते थे और मिस्त्र वाले कुश और कृष्ण को मानते है। बचा विरोचन का प्रदेश तो उत्तर और दक्षिण का प्रदेश पूरी व्यवस्था यूनान से विपरीत है। 
और वैसेभी पूरी पीठाधीश शंकराचार्य ने कहा है 4 दिशा में चार परमप्रप्राप्त क्षत्रिय को जाना है , और विश्वामित्र क्षत्रिय कुल के दीपक थे ये याद रखना जो हमेशा राजनायक की क्षत्रिय नीति वैकल्पिक है या परंपरा प्राप्त ये सबसे महत्वपूर्ण बात है। जय बगलामुखी।।
जय बगलामुखी ठाकुरजी, फिर आगे भेट कब ??
जब चाहे आ सकते हो यही , में तुम्हे यही मिलूंगा तुम्हारे आखिरी राजनायक के मिलने तक ।
वो कहा मिलेगा मुझे??
इसी शहर में।
और मुझे इतने राज्य को स्थापित करने के बाद अपना क्या मिलेगा ।
अभी तुम तुम्हारे खरे वैष्णव शिष्य से मिले नही इसलिए यह मोह तुम्हे बांध रहा है गिलगामेश मुझे तब मिलना जब तुम्हारा शिष्य तुम्हे मिल जाए।
जी ठाकुरजी , धन्यवाद ।



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