योगेश्वर सोमवंशी
ठाकूर जी , आप से मिलके लगा जैसे वो लखण को मुसा मिल गया हो | क्या होगया योगेश्वर आज इतणे सभ्य और सौम्य शब्द और वो भी तुमसे , तुम तो वादग्रस्त और क्रांतिकारी शब्द के लीये जाणे जाते हो . मेणे उसकी चिकणी बातो को कुछ जाणणे की भूक को समझते हुये उससे पूछा | हा आप से मिलने से पहले मुझे लगता था की जितना ही सब कुछ हे लेकिन आप से मिलकर लगा की जाणणा और फिर भी उदासीन स्वभाव से उसे स्वीकार करना ये सबसे महत्वपूर्ण हे | उदासीनता और वैराग्य मे फरक होता हे योगेश्वर , मे कर्म करता हू और मुझे यहा सब का लेखा जोखा रखके उसे लोगो को एक पथ पर ले जाणे के लीये सामग्री बनाने का दायित्व हे . वही मे भी कह रहा था ठाकूर जी अगर सब कूच जाणणे के बाद मे आप के जगह होता तो मे आदेश देकर सबसे ये आशा करता की वो उसका पालन करे | पर आप सब तथ्य सामने रखके के बस उपदेश करते हो स्वीकार करना हर व्यक्ति पर छोड देते हो मेने बचपण से देख रखा हे Diplomacy always win over talent | वो क्यो भला बचपण की यादो मे खोए हुये को ये जगत मे जिना मुश्किल हो जाता हे. आप सही हो सकते हो ठाकूरजी पर मे बहुत बार हार ...