गृहस्थ आश्रम और योगी के ज्ञान का अंतर_1
महासेन कोण है यहां ???
वो रहा महाराज, आजकल की बारिश के हिसाब से गांव में मिल गया है नही तो खेत में जाना पड़ता ।
महासेन हम रामानंद वैष्णव यहां आपसे ये अनुरोध करना चाहते हैं की आपका सहयोगी योगेश्वर गलत संगत में रह के आया है और अब हम चाहते हैं कि आप इसे जरा गृहस्थाश्रम की समझ देने की बात करने आए है।
आप से मिलना हमारा परम भाग्य है महराज, योगेश्वर किस की बात हो रही है किस की संगत में फसे थे । मेरे हिसाब से में तो सही दिशा में था एक के बाद एक संघर्ष में विजय प्राप्त करने के बाद मुझे नहीं लगता की किसी गलत संगत में ये possible है , मुझे लगता है कि महाराज को कुछ विपरीत माहिती है गिलगामेश के बारे मे।
महाराज गिलगामेश अनुशासित और परावृत व्यक्ती है। वो किस प्रकार से गलत है जरा समझाइए।
ये प्रश्न में ही उत्तर है। महासेन ये पक्के तौर पर एक अकेला व्यक्ती जो जग के मोह से दूर हो कर पूरे जग को अपने से दूर करेगा तो उसे यह संसार के लिए वो उपयोगी नहीं रहेगा , संसार मे गृहस्थ आश्रम में न अनुशासन चले है न्हाई परावृति।
ठीक है पर जो मुकाम योगेश्वर ने प्राप्त किया वो गिलगामेश की सारथ्य के साथ ही न।
हा पर वोही अब से आगे योगेश्वर के सामर्थ्य को एकही दिशा में रख कर पूर्ण रूप में विकास को बाधा उत्पन्न कर सकता था इसलिए या गिलगामेश के वयक्तिक लक्ष्य को साध्य करने के लिए आवश्यक है की वो अकेला अपने सफर पर चल पड़े ।
ये कारण है तो ठीक है आगे में इस सोमवंशी क्षत्रिय को गृस्थाश्रम का आसान ज्ञान और अनुभव बता सकता हु ।
पर यह उपदेश की बात होगी न की आदेश जी तुम अब तक करते आए हो योगेश्वर।
ठीक है महासेन जी आप गिल्गमेश के साथ रहते हुए उससे इतना भी अलग सोच सकते हो तो में आपकी भी बात को नही टालूंगा ।
यही फरक स्पष्ट रूप से है योगेश्वर में suggest कर सकता हु लेकिन आगे से डिसीजन तुम्हे लेना है ।
ठीक है मैं आगे से ध्यान रखूंगा ।
ठीक है महाराज जी आपकी बात में समझ गया और कुछ सेवा , यह संसार को तुम दोनो से कुछ राज्य चलाने में सक्षम बनाता है तुम्हे अब ये तय करना है विश्वनाथ पुत्र की तुम्हे युद्ध में सेनापती बन कर अपना नाम सार्थ्य करना है या फिर एक किसान या ग्वाला बन कर रहना है ।
आप तो मुझे स्कंद या कृष्ण में से किसी एक को स्वीकार करने की कह रहे हे तो में माधव को चुनूंगा रामानंद जी ।
अप्रतिम ।।। में भी यही बताने आया था की तुम भले खुद को शिव के पुत्र हो पर तुम भी खरे वैष्णव हो क्योंकि पवनपुत्र हनुमान और शिव स्वयं राम जी के भक्त है और राम ही द्वापर में कृष्ण बने । और तुम योगमाया योगेश्वरी जो कृष्णा जी की बहन है उसके वंशज हो ।
पर महाराष्ट्र के लिए तुलजा भवानी हम अपनी कुलदेवी मानते हैं रामानंद जी।
यही तो स्वीकार्य है की एक ही शक्ति के 4 रूप महाराष्ट्र में पीठ कहे जाते है और बाकी तो ग्राम देवता तक का रूप धारण कर माता ने खुद को स्थापित किया है।
और मेने जो कहा वो तुम्हारे लिए उपदेश समझो की वो सत्य है बाकी तुम्हारी अपनी मर्जी।
जी रामानंद जी ।
योगेश्वर पहला सबक का उदाहरण तुम्हारे सामने भलेही ये कितने भी महान व्यक्ति के द्वारा कहा या लिखा गया ही वो जब तक तुम्हारी आस्था नही हो तब तक तुम मानने से इन्कार कर सकते हो लेकिन तुम्हारी आस्था बने तो वो कितना भी बड़ा झूठ हो वो तुम मान लेते हो ।
ठीक है ये मेरे लिए पहली बार है । कुछ कुछ समझ आया है।
ये बात आपके लिए में कर सकता हु में या फिर योगेश्वर अपने समय के अनुसार आप के साथ ही ऐसी बैठक बनाते रहेंगे।
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