""समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध, जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनके भी अपराध"""
तो वो दिन आज आही गया गिलगामेश, तुम्हें इस संसार का रामानंद बनाया गया है और तुम्हें इस बार वही बात फिर याद दिलाना चाहता हूं अपना अतीत हर समय तुम्हारा पीछा करता रहेगा तुम्हें चयन करना होगा सामने लढ़के जितना है या रणछोड़ बनके भागते रहना है।
तो आप मुझे मेरे अतीत से मिला सकते हो।
जामाता तो तुम्हे बनना ही है पर समय तुम्हारा चयन मांगता है जैसे सती से विरक्त होकर शिव ने फिर पार्वती की तपस्या का फल उससे संसार करके दिया वैसे तुम्हारा वैराग्य तब तक रहेगा ,जब तक कोई तुम्हे अपने आप से फिर नयेसे शोधन कराएगा और वो विश्वामित्र को मिली हुई मेनका भी हो सकती है जो तुम्हे अपने लक्ष्य से दूर रहने में बांध सकती है।
इतना सब बोल रहे हो माना की हम अपने आप को समर्पण और योग कुछ समय आगे सोच सकते हैं पर आप जो बोल रहे हैं उससे मैं पूरी तरह से सहमत नहीं हूं , क्योंकि पिछली बार का अनुमान कुछ हद तक सही था पर मुझे उसमे कमिया नजर आई।
चलो सूर्यकुण्ड में खाड़ी के पास ये बोल सकते हो लेकिन समुद्र में मेरा हर लफ्ज़ कीमती होता है था और रहेगा ये ध्यान रहे। तुम्हारी बातों से ये तो मानता हु के कुछ नकारात्मकता आई ही है इस योगी में जो की ठाकुर कभी नही मानता था की ये होगा । और कारण बही होगा अतीत , आप अपने अतीत को इतने आसानी से बता देते हो की ये सब होता रहता है । पर मुझे ये अनुभव पहली बार मिला है।
तुम्हे चुप रहने की सजा माफ करना सलाह ठाकुर ने दी थी ??? क्या में सही हु ।
आपने सजा कहा मतलब क्या है उसका ।
देखो में तुम्हे धर्म को इस नजर से देखने की सलाह दे रहा हु की वो बुद्धि और अनुभव का संघर्ष है क्योंकि तभी हर युवा पीढ़ी अपने शक्ति को अपने पितरों से अनुभव तो लेंगे पर वो इतिहास है जो परोक्ष होता है जिसने देखा वोही अपनी नजर में समय होता है।
हर व्यक्ति को इतिहास न्याय नहीं देता जो तुम अपने सारथ्य में सीखे या सिखाए हो। जगन्नाथ की भूमि में वो कुछ पीडिया चलेगा ऐसा मन लेते हैं पर हर भूमि का इतिहास विपरीत परिस्थितियों के प्रभाव में आकर बदलता रहता है नही तो लाहौर और कसूर में आज भी लाव और कुश विराजमान होते ।
पर मुझे ये बताईए हिंगलाज माता को नानी पीर क्यों बुलाते है।
यही कारण है की आज झेलम , चिनाब, रावी , इन्ही नामोसे जानते हो नदियों को कुछ महीने बाद सिंधु को भी कुछ और बोलने लगोगे क्या ???
तुम्हारे बुद्धि के लिए और एक उदाहरण देता हु बेलगांव और बेलगावी क्या फर्क है, हैदराबाद और भाग्यनगर क्या फरक है ।
मेरे लिए कोई फर्क नहीं है जनाब ।
तुम जैसे उदासीन लोगो को ही शास्त्र में से ध्रुव , प्रल्हाद, कृष्ण, को दोनो नजर से देखने की आवश्यकता होगी क्योंकि अगर सिर्फ उनकी भक्ति या उनकी छोटे उम्र की उपलब्धियां ही तुम्हे ज्ञात हो और उनका उत्तरार्ध कैसे हुआ उनका जीवन कैसे समाप्त हुआ ये भी उतना ही जरूरी है ।
उनकी वैष्णव या विश्वरुपी लीला सबको ज्ञात है लेकिन उनके लड़े गए युद्ध क्यों कोई नही जाना होगा पता है तुम्हे ।
बताए ।
क्योंकि कभी ठाकुर से सुना है तुमने तुमसे ये उम्मीद नहीं थी ।
नही पर इस तरह की बाते उस दिन हुई थी जिस दिन किशोरी के बारे में मैने उन्हे बताया । और जब तुम महाराज से मिले तो उन्होंने क्या कहा उन्होंने कहा को योगी को कबसे मोह होने लगा । और आज मैने क्या कहा - नकारात्मकता के बारे में बोल गए आप आज ।
इससे ये समझ में आता है की तुम आज उस समय मैं हो जब समय ने ध्रुव को अपने भाई की मृत्यु की बात बताई थी , जिस दिन प्रल्हाद को अपने भाई अंधक की मृत्यु की बात बताई थी और विश्वरूप श्रीकृष्णजी को अपने पुत्र को दुर्वासा से शाप की बात पता चली थी तुम्हारे सामने चयन के दो मार्ग है गिलगामेश अपने स्वप्नवत अतीत को ढूंढ कर इसके मोह में पूरी श्रृष्टि को नष्ट करने की बात सोचो या विश्वरुपी चिदंबरम होने के नाते अपने मोह को त्याग दो तब नकारात्मकता काम होगी और किसी को अपनी भूमिका निभाने के लिए आवश्यक सामग्री और उसका दायित्व देकर सम्मानित रूप से निवृत होकर निकल जाओ।
में अगर पहला मार्ग चुनूं तो ??
तो बता दू ध्रुव शिवजी के हातो से मृत्यु को प्राप्त हुआ , प्रल्हादजी जो असुरों के और से समुद्र मंथन में भाग लिए उन्होंने शुक्राचार्य को शिव जी से मृतसंजीवनी के लिए मिलाया और अंधक के लिए आवश्यक युद्ध लड़े और इंद्र के हात से मृत्यु को प्राप्त हुए पर इसकी कोई ज्यादा बात न करके उन्हे खरा वैष्णव बोल के उन्हे सम्मान देते है ।
दोनो के वंश आगे बढ़े और कही जाकर फिर बान शिव जी के हात से मृत्यु को प्राप्त हुआ और महराज पृथु को इंद्र का सामना करना पड़ा और यज्ञ में हानि हुई।
तो आप का अनुभव क्या कहता है क्या करे ??
दूसरा मार्ग इतना भी आसान नहीं है और एक योगी वो साध्य कर सकता है जो गृहस्थ नही कर सकता, आपका मतलब गृहस्थ योग नही कर सकता।।।
नही वो बात नही, क्रिया योग जो (तप , स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान) वो तुम सिर्फ दूसरे मार्ग पर चलने से ही कर पाओगे ।
तभी खरा वैष्णव तुम्हे अपना गुरु बना पाएंगे।
वो एक होंगे या अनेक ,
उससे क्या फरक पड़ता है गिलगामेश ??
क्योंकि ठाकुर जी ने कहा था की हर वनवासी को राज्याभिषेक कराने तक उस जगह से मुझे तुर्की या वरका तक नहीं पहुंचा जा सकता ।।।
ठीक है लेकिन बगलामुखी तुम्हारे साथ हैं और तुम्हे त्रिकालदर्शी बनने तक कोई भी वैष्णव शिष्य नही मिलेगा तब तक तुम्हे सिर्फ कृष्ण जैसे युद्ध में शिष्टाई करने की समझ रखनी होगी और हर जगह तुम्हे शिष्ठाई की जरूरत नहीं पड़ेगी जब तुम कुर्दो से मिलोगे तb मुरूगा तुम्हे मिल सकता है तब तक तुम्हे अपने लक्ष्य को स्वयं प्राप्त करना है।
और बाकी लोग , आप वो कब मिलोगे।
में तुम्हे तुम्हारे विवाह तक साथ दूंगा फिर वरका मैं तुम्हे अपने शासन को चलाने में आवश्यकता होगी तो मुझे याद करना ।
मेरा विवाह उस को लेकर आप क्या जानते हो ।
अभी तक तो कुछ नहीं ।
पर 5 साल से जिसके साथ थे उसने कुछ सोचा होगा तुम्हारे लिए या वो तुम्हारे संघ का पहला जमाता कुछ डूंडेगा तुम्हारे लिए।
मतलब उनसे मुलाकात होती रहेगी ??
विवाह एक दिन में सो रहे सभी अतिथियों को जगाने का जरिया होता है और उसे एक विजय , यश का मिल का पाषाण कहा जाता है ।
अब वो तुम्हे कब और कहा मिलेगा ये चयन फिर तुम्हारा है योगी ।
पर फिर क्रिया योग का क्या ।
तुम दो नावों में पैर रख रहे हो योगी फिर चयन तुम्हारा तुम्हे पानी में डूबा ही देगा ।
कोई एक मार्ग चुन के मुझे अगले अमावस्या को मिल लेना ताकि कृष्ण अष्टमी तक तुम्हे वृंदावन और आगे अश्विन दुर्गाष्टमी को तारापीठ को पहुंचना है।
अब ये सब कब तय हुआ चंद्रशेखर जी ।
योग अगर तुमने ठाकुर से सीखा है तो तुम्हे ये पता होना चाहिए की सभी शस्त्र जो बाह्य है उसके बिना जो लड़ते है वो खुद को मार्शल आर्ट्स से जोड़ते है वैसेही तुम जुड़े हो योग से जो किसी भी बाह्य वस्तु के भौतिक जुड़ाव के बिना मंत्रो को लेकर लड़ते है और तुम्हे जैसे मार्शल आर्ट्स से जुड़े लोग बाह्य शस्त्रों को जानते है वैसे बाह्य जुड़ाव से व्याप्त रणभूमि को जानना जरूरी है क्योंकि तभी तुम त्रिकाल दर्शी और समय सूचक निर्णयक्षमता प्राप्त करोगे ।
पर फिर में तंत्र क्यों नहीं सीख सकता जिसकी आप बात कर रहे हो।
फिर दो नाव की सोच मत दिखाओ गिलगामेश तुमने योग को चुना तो तुम उससे निकल कर कही भी घूमो हम तुमसे ना जुड़ते ।।।
पर योग ने ठाकुर के ज़रिए तुमको चुना है तो तुम्हे योग को लेकर एकनिष्ट रहना होगा और योगी होकर गृहस्थ आश्रम का चयन न करना या करना ये अभी तक अगर निर्णय नहीं हुआ तो तुम्हे निर्देश कोण और कैसे देगा ये तय नही होगा ।
और अगर में इससे निकल कर अपनी गृहस्थ जीवन की नई शुरुवात करना चाहूं तो ।
कोई आपत्ती नही , हम तो दूसरा रामानंद बना लेंगे क्योंकि जो तय है वो तो होगा ही बस तुम्हारी उसमे भूमिका क्या है ये तुम्हारी योग्यता से तय होता है और बस एक गलत चयन हमे या सृष्टि को कुछ माह पीछे ले जा सकता है पर तुम्हे वो पूरा जीवन सताता रहता है और तुम भी अपने अतीत को कोसते रहते हो।।।
ऐसा लग रहा है अनुभव पूरी तरह से बुद्धि को व्याप्त कर चुका है आपके । तुम्हे एक ही कहानी सुनकर अलग अलग अनुभूति होती रहेगी गिलगमेष आज यही समझ लो । तुम अपने परिवार से जुड़े हो मैं तब से नही हु जब मेरा एक गलत चयन ने मेरे परिवार को असुरक्षित बना दिया।
उस समय पर तुम अभी हो अगर तुम्हे ध्रुव , प्रल्हाद या कृष्ण से कुछ नही सीखना तो ।
पर में दोनो को लेकर सामन्य नही हो सकता क्या??
गिलगामेश ये अंतिम बार तुम्हे चेतावनी के स्वर में बता रहा हु के तुम्हे एक चयन करना होगा दो पैलू में से एक को त्रिदेवो को भी तटस्थ रहने की शिक्षा मिली है ब्रम्हा का 5 वा मस्तक गया , विष्णु जी को अवतार लेना पड़ रहा है, शिव जी को हर असुर के साथ रहना उसे वरदान देना और अपने अंशो से लड़ना पड़ा ।
जो तटस्थ रहे महाभारत में उन्हें भी अपने अपराध का दंड मिले है ।
चाहो तो सप्तर्षि , सप्तचिरंजिव, मार्कण्डेय बन सकता है तू अगर दिव्य ज्योति जागृति होगई।
इंद्र और ब्रम्हा का भी चयन होता है इसी भूमि पर मृत्युलोक में ।
पर एक मार्ग का चुनाव करना होगा, जो लिखेगा तेरा अंत कैसा रहेगा।
आज से अमावस्या का समय दिया था आपने में सोच विचार कर लेता हूं। चयन मेरा ही तो में अवश्य अपना अंत चुनूंगा जो विजय , यश और कीर्ति को दर्शा देता हो।
विधि विधान अगर में तय कर लू वो किसका आदेश माना जायेगा ।
धर्म सिर्फ उपदेश देना जानता, आदेश अंतर्मन और खुद योगी का योग देता है।
ठीक है मानता हूं आपकी बात, मिलेंगे फिर यही ।
धन्यवाद, प्रयास कर के संसार में रहे विरक्त होकर निकल अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने।
अवश्य प्रयास करूंगा।
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