मैं खरा शैव, परशुराम, अश्वत्थामा, रावण को मेरा प्रणाम
कहा चल दिए साहब जी अकेले लग रहे हो ।
हा यहां से वृंदावन जाना है ।
मुझे लगता हैं कि आप कुछ खोजने जा रहे हो ।
वैसा ही समझो , मुझे जिसकी तलाश है वो मुझे भी पता नही पर सफर कर रहा हु।
तुम हो कोण बालक, और बड़े लोगों से किस प्रकार वे की जाती हैं वो तुम्हें माता ने बताया नही क्या
।
अघोरी, मयांग की साधिकाएं इनसे कोनसा रास्ता तुम्हे बचाएगा बोलो।
नही पता या पता हो पर तुम्हे उससे क्या ।
में तुम्हारी अपनी नजर बदलने में मदत कर सकता हु , पर क्यों ।
क्यों की तुम अभी उस काबिल हो या नहीं ये खुद तुमको पता नही।
क्या तुम सच कह रहे हो।
में तुम्हारा दोस्त या फिर गाइड बन सकता हु।
ठीक है।
एक मिनिट तुम ने अभी जो मेरे साथ किया है उसे में पहले कभी पढ़ा हु।
वो five states of grief hi hai aisa muze लगता हैं।
मतलब क्या होता है उसका ।
मतलब तुम मुझे दुख को इंसान किस प्रकार से मान्य करता है उसके 5 नियम कहलो या तरीके है जैसे हम दुख में वर्तन करते है।
पहले तुमने मुझे जी बताया मेने उसे पूरी तरह से दुर्लक्षित किया ।
दूसरी बात ने मुझे थोड़ा गुस्सा दिलाया ।
फिर तीसरी बार में तुमसे वार्ता करके दुख से बचने का तरीका पूछने लगा ।
4 थी चीज से मुझे थोड़ा अपना गौण होने का एहसास हुआ।
5 वी बार मेने तुम्हे स्वीकार किया।
चंद्रशेखर ने बोला था कि कोई वैष्णव गुरु तुम्हें मिलने के बाद ही वृंदाबन और तारापीठ के लिए जायेगा।
और अगर तुम्हे वो मिले तो वोही सिर्फ तुम्हारी भाषा को समझ पाएगा ।
अपना परिचय दिया होता तो शायद अच्छे से बात होती थी ।
ठीक है लेकिन कुछ चीजे ज्यादा अच्छे से अनजान ही समझा सकते है ।
तो तुम कहना चाहते ही की तुम अपना परिचय नही दोगे।
वैष्णव गुरु किसका परिचय मांगे और वो न दे ऐसा होगा ही नही। साक्षात हिंगलाज या बगला माता या कबीर जी भी पधारे तो वो भी खुद से परिचय देंगे में तो तुच्छ मनुष्य हु ।
में श्रृंगेरी मठ से निकल कर अभी ज्योतिर्मठ जानेवाला वीरशैव उपासक हु कुछ ऐसा हुआ है कि मुझे भेजा गया है या निष्कासित किया गया है इसका पता नही पर आपसे मिलके खुशी हुई। शायद मुझे बहुत जल्द ही ये खबर मिल जाएगी की तुम्हे जहा जाना है वहा जाओ तो में आपके साथ वृंदावन आ सकता हु।
तारापीठ का मुझे पता नही पर वृंदावन धाम तक में आपके साथ a सकता हु।
मुझे हैरानी हुई की कृष्णा के धाम में एक वीरशैव उपासक क्यों आ रहा है और सिद्धि प्राप्त उपासक कुछ हद तक आस्था से खिलवाड़ न करते हैं नही होने देते है । बुरा न मानो पर निष्कासित करने का कारण क्या हो सकता है।
में सन्यास ग्रहण करने के बाद भिक्षा मांग के अन्न भोजन करता था लेकिन अब मेने सोचा था कि क्यों न मैं एक व्यवसाय में अपना योगदान दु।
इसलिए मैने माइनिंग के क्षेत्र में कुछ साथियों को लेकर अपना काम शुरू कर दिया।
और मेरे हर एक साथी ने में छोड़ कर सबने गृहस्थ जीवन को अपना लिया ।
में अब अकेला बचा जो संन्यासी माना जाता था और मेरे साथियों को अपने हिस्से की चिंता होने लगी इसकी मुझे भनक भी थी पर ये आवश्यक प्रवास मठ ने मूझ पर पहले से सोप दिया था और ये कहा था की बाकी साथियों को लेकर वहा हाजिर होना पर बाकी सबने साथ छोड़ दिया। और मुझे अकेले यहां आना पड़ा और जब में वहा से अकेला निकला तब दोनो मठों में खुलासा हुआ कि मेरे साथ रहने वाले अधिकतर सन्यासियो ने कुछ वचनों को तोड़ा जो मठ के नियमो से परे है।
मुझे भी उन्ही नियमो के उल्लघंन में निष्कासित किया जा सकता था पर मुझे ज्योतिर्मठ को प्रवास करने को कहा गया एक नया साथी मुझे दिया गया पर वो भी बीच में दूसरे रास्ते मठ में लोट गया और में आपकी सेवा में प्रस्तुत हु।
चलो जो होता है अच्छा होता है मानो और मेरे साथ वृंदावन में चलो।
पर मेरे विचार से हमेशा अपना सहमति नही होगा फिर भी मैं आपकी साथ रह सकता हु ये भी समझ ले ।
मेरे बारे में भी कुछ तुम जैसा ही हाल समझो बस में जगन्नाथ की भूमि से पहले मां बाप से मिल कर दिया हुआ काम को पूरा करना है इसलिए बहुत समझने के बाद इस सफर पर निकला हु।
फिर भी वृंदावन में कृष्ण के लिए लोग जाते है।
तुम क्यों जाना चाहते हो।
मुझे लगता हैं कि में अश्वत्थामा से मिल पाऊंगा।
तुम्हारी सिद्धि अगर निष्पक्ष होगी तो तुम कामयाब बन जाओगे। बाकी कोई टिप्पणी नहीं करूंगा पर वो तो कृष्णजी जी के शत्रु मानेवजाते है ना ।
है तो वो शत्रु पर शिवजी के अंश है। हम शैव लोगो के लिए परशुराम , रावण, अश्वथमा, बसवान्ना, शंकराचार्य ये लोग सभी जानो को प्रिय मानबिंदु है।
भलेही वो प्रवाह की किसी भी और से लड़े हो ।
चलो ठीक है । तुमने सही कहा था में तुम्हारे हात मत से सहमत नहीं हो सकता । सुबह उतरना है अभी सो जाना ठीक रहेगा ।
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