वृंदावन पधारो , वैष्णवाचार्य
देखने में तो आप वैद्य जैसे लगते है पर आप कुशल कारागीर हो ये जान कर हैरानी हुई गिलगामेश जी , आचार्यजी उसे इंजीनियर कहते है हा हा वो अंग्रेजी में कहते है पर इस धरा पर तो आप कारागिर ही कहालाओगे।
ठीक है समझ गया पर आप मुझे नाम से बुलाओ ये ठीक रहेगा ।
कोण आया है देखो वृंदावन में भगवताचार्यो ।।।
ये कोण बालक बुलाया है । नेताजी लग रहा है नेताजी शादी हुई क्या आप की या अजीवन ब्रम्हचर्य का व्रत लिए हो ।
ये कोण है , आप दूसरे पाठकों से मिलिए वैष्णव कुमार , ये अपवाद है इन आचार्यों में।
अरे और ये कोण साथ लेके आया है एक त्रिपुण्डधारी शैव को यहाँ इस शैव का उपस्थित होना निश्चित अच्छा नहीं होगा ।
और मेने सुना है की ये बालक आगे तारापीठ को जानेवाला है क्या इसे यहां जगह देना उचित रहेगा ।
आपको ये सब बाते किसने बताई गुरुवर्य , वैष्णव कुमार यह से चलो , किसी ठीक जगह आराम करो , क्षमा व्रजनिवासी आचार्य पर इन्हें इनकी जगह तक पहुंचने का वचन है मेरा ।
पर मुझे उचित लगेगा तब तक तुम्हे में रोक सकता हु , माध्वाचार्य,
आप अपना स्थान ग्रहण कर ले और इन्हे भी कहे मेरा सामना करे।
क्या आप यह के द्वारपाल है गुरुवर्य। इसी तरह की उपरोधी भाषा से पूरा यदुवंश समाप्त हुआ बालक। ऐसी बाते करके तुम अपने ऊपर श्राप का बोझ बढ़ा रहे हो।
गुरुवर्य जब कर्म भगवान के वंश से नही चुका तो मैं तो एक सामन्य वैष्णव हु। पर परिणाम तुम्हे देवो से भयानक भोगने होगे। जय बगलामुखी _ ठाकुरजी, चंद्रशेखरजी, मुरूगा, और भविष्य में साक्षात कबीर को मेरे आवश्यकता है तो मैं परिणामों की चिंता कम ही करता हु।
ये तो शक्ति का उपासक है , ये शुद्ध वैष्णव है भी या नहीं ।
माध्वाचार्य ये किसे लेके आए हो । एक तो वैष्णव को संसार चलाना है और वो गृहस्थ जीवन मे ना हो ये कैसे संभव है।
विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को ब्रह्मचारी समय ही मिले और युद्ध किया गुरुवर्य, और 14 साल का कृष्ण ही कंस वध किया था वैसे ठाकुरजी , बांके बिहारी तो जन्म से ही शत्रुविजय में निपुण थे।
तो युद्ध का प्रतीक लेके आए हो बालक , और शिव उपासक ले हो , वैष्णव शिष्य अब युद्ध करेंगे तो संसार का पालन कोण करेगा ।
नृसिंह, वराह, गंदभेरुंड, नवगुंजर, ये विष्णु जी के ही अवतार है गुरुवर्य। इन्होंने ही युद्ध को लेकर अपना पक्ष कायम किया है।
हम तो ब्रज वासी हैं हम सिर्फ हरे कृष्ण को मानते हैं।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ ४-८॥
इसे तो मानते हो ना गुरुवर्य ।
पर राम और परशुराम और कृष्ण और वामन इनके वंशज, उपासक, भक्त, ये अलग अलग है ।
ये अलग अलग होता है क्या , हमारे यहां तो एक ही वर्ग है वीरशैव उपासक, त्रिपुण्डधारी से में सहमत हूं हम भी सब वैष्णव है , क्या कहना है आपका गुरुवर्य ।
हमे गुरु बना दोगे तो तुम कब रामानंद बनोगे गिलगामेश।
क्या हम पहले मिले हैं, गुरुवर्य ,
मैं रामानंद हू अब पहचाना ।।।
अपने तो कहा था हम अब युद्ध के अंत में मिलेंगे, पर अब यहां??
मुझे इतने सहज रूप से निवृत होकर जाना असंभव लग रहा था तुम्हारी अपनी आस्था और श्रद्धा के साथ।
पर तुम में कुछ तो बात है की ठाकुरने तुम्हे चंद्रशेखर तक पहुंचने में मदद की, और चंद्रशेखर ने तुम्हे उस लायक समझा और तुम मेरे शिष्य शिवराज के साथ यहां तक पहुंचने में सफल रहे।
मतलब ये सब आपके आज्ञा से चल रहा था रामानंद जी ???
वो क्या कहते है तुम्हारी अंग्रजी में रिक्रूटमेंट प्रोसेस चल रहा था तुम्हारा समझे।
ठीक है चंद्रशेखर जी ने सच में HR जैसा ही काम किया है??
तो में आपके इस जगह में कब तक रहूंगा गुरुवर्य।
तुम्हे शिवराज अगली कृष्णअष्टमी यानी अश्विन कृष्ण अष्टमी को यहां से तारापीठ के निकलकर अतिथि कक्ष तक पहुंचने में मदद करेगा।
वो वहा रहेगा , या फिर ज्योर्तिमठ जायेगा । याद करो वो बाते गिलगामेश , एक बात होती है हर एक के सामने अपनी जिंदगी उगल देना और एक बात होती है अपनी पूरी नई कहानी हर बार बनाना , शिवराज अब मुझे जो सच्चाई पता है वो सच हो तो उसे भी बता दो।
गिलगामेश में गुरुजी का शिष्य हु और ज्यादातर ज्योतिर्लिंगो से जुड़ा रहता हु , कुंभ के मेले में और श्रावण मास में काशी विश्वनाथ मंदिर में उपस्थित रहता हु, गुरुजी ने बताया की सोमनाथ से वैष्णव गुरु आ रहे हैं, उन्हे याहा तक पहुंचने में मदद करो, और माध्वाचार्य तुम्हे वृंदावन में मिलेंगे।
क्या ये पूरा सच है ??
अभी के लिए ये ही सच है , वैसे भी हम बात ही युद्ध की कर रहे है तो तुम्हे विशेष रूप से ध्यान रखना होगा अपनी पहचान और अपने दिए गए कार्य का ।
एक पद तभी सिद्ध होगा जब तुम महाराज जी को गद्दी pe बिठाओ,
महाराज जी कोण??
गिलगमेंश हर वनवासी जी राज्य चलाने में सक्षम हो वो महाराज है तुम्हारा , और पूरा चयन तुम्हे करना होगा।
ठीक है ।
धन्यवाद इस समय और सम्मान के लिए।
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