विनोदी कलाकार: आधुनिक चार्वाक
काय महासेन , बऱ्याच दिवसांनी दर्शन दिले देवळात येऊन .
हा मित्र आणि महाराज आले होते म्हणून भक्त निवासात व्यवस्था करावी असे वाटले म्हणून त्यांना घेऊन आलोय .
हे रामानंद गुरुजी आणि हा योगेश्वर .
कुठून आलात .
हम बगलामुखी के गाव से हैं , और में जगन्नाथ की भूमि पूरी से ।
धन्यवाद आपका इस पावन भूमि में अपने दर्शन और सानिध्य के लिए गुरुवर्य , योगेश्वर कपड़ो से तो आप कोई नेता लग रहे हो।
हा महाराज में पूरी धाम का विधायक बना हु 4 साल पहले ।
गुरुवर्य जैसा आपको पता हो आप अभी श्रीपद वल्लभ दिगंबर दत्तात्रेय और रेणुका माता के मंदिर में खड़े हो ।
भले ही ये ग्राम देवता बने है पर आपको इनका नाम और काम पता ही है।
ये हमारे मानबिंदु है देवकुलिक जी एक भार्गव राम जी की माता है और एक विष्णुजी का अंशावतार है जो चंद्रवंश का जो त्रिकुट है उनका मध्यबिंदु है ।
मध्यबिंदु का मतलब गुरुजी ?
चंद्रवश सुरू ब्रम्हा जी के अवतार चंद्रत्रेय से हुआ और शिव जी के अवतार दुर्वासा जी के शाप से प्रथम यदुवंश समाप्त हुआ ।
यही त्रिकुट चंद्रवंश का प्रारंभ और अंत है।
समझ गया गुरुवर्य ।
यही नहीं परशुराम जी की जननी और विश्वामित्र जी की
भांजे की पत्नी रेणुका जी ही है जिन्हे याल्लमा, एक वीरा, इन नामोसे जानी जाती है।
वैसे हमारा महासेन भी युद्ध के देवता का नाम धारण करने के बावजूद चार्वाक जैसी बाते करता है।
जैसे क्या देवकुलीक जी??
ये जब बालक यहां आया था गुरुवर्य तब ये तंजावुर से राज राजेश्वरी की मूर्ति लेकर आया था और तब ये कहता था दोनो में अंतर क्या है ।
पूरे जग की माया जगदम्बा में ही है। मेरी कुलदेवी मा तुलजाभवानी ही है ये।
और कुछ महासेन जरूर तुम गिलगामेश जैसे व्यक्ति के साथ रहे हों
यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥गे ।
पर आपने तो उसे ठाकुरजी से मिलके विदेशभ्रमण और युद्ध के लिए भेजा है ना रामानंद महाराज।
हा शायद पर महासेन मुझे लग रहा है,
गृहस्थ आश्रम में रहने के बाद भी तुम कुछ वैष्णव गुण से अवगत नही हो पाए हो ।
कुछ बुद्ध तत्व का भी प्रवाह है गुरुवर्य ।
पर मैं तुम्हे याद दिलाना चाहता हूं की तुम भले देवसेनापति का नाम लगा रहे हो , मुरुगा तुम्हारा बालमित्र ही स्वयं युद्ध के लिए आवश्यक होगा तुम्हे यहां समाज में रह कर दिशा दिखानी है।
तुम्हारा काम है वही बुद्ध तत्व को जान कर उसे हमारी सोच से चार्वाक दर्शन को समाज के उद्धार के लिए उन नास्तिक दार्शनिकों और देशों में भेजना है जहा आज बौद्ध धर्म प्रचलित है ।
देवगुरु बृहस्पति को कभी तुम वेद के विरोधक कह पाओगे नही न । पर चारु वाक का मतलब है मीठी बोली बोलने वाले , मतलब आज के कामेडियन क्योंकि तुम्हे तो पता बिना किसी की निंदा किए कामेडियन अपना योगदान ही नही दे इसका मतलब है कि जब तक ज़िंदगी है, तब तक सुखपूर्वक जीना चाहिए. अगर साधन नहीं हैं, तो ऋण लेकर भी घी पीना चाहिए. शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस लाया है.
इस वचन को तुम कुछ कुछ समझ तो रहे होंगे ।
इस वचन को तुम कुछ कुछ समझ तो रहे होंगे ।
हा गुरुवर्य ये ऐसा ही है जैसे अगर किसी का अनुभव हम चार लोगो में शेयर करें तो दो चीजे होती है जो गलतियां उसने दोहराई है वो हम न दोहराएं और वो कुछ ऐसा भी अनुभव कर रहा है जो हम कल्पना नहीं कर सकते।
"यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥"
इसका मतलब है कि जब तक ज़िंदगी है, तब तक सुखपूर्वक जीना चाहिए. अगर साधन नहीं हैं, तो ऋण लेकर भी घी पीना चाहिए. शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस लाया है.
इस बात पर मुझे देवकुलिक के नाते कुछ आपत्ति है गुरुवर्य आप चाहे तो में अपनी भूमिका रखू।
अवश्य पर ध्यान से अगर मेने जो कहा है वो आप समझे तो मेने कहा है जहा अभी बौद्ध तत्व का वास है वहा ।
देखो हमे तो पता है की अनुभव करने के या ना करने के बावजूद चार्वाक या नए कॉमेडियन हर चीज को समाज में प्रसारित कर सकते हैं और जब कोई बुरी घटना बिना किसी पूर्वाग्रह से प्रसारित होनी होती है तो यही चार्वाक हमे मदद कर सकते है।
पर गुरुवर्य आर्य सनातन वैदिक हिंदू धर्म को अवैदिको की विचारधारा की आवश्यकता है गुरुवर्य ?
जो अगम और निगम अनुभव किए बिना उसे वरदान या शाप कह दे वो समाज तो मेरे हिसाब से सिर्फ निंदा करता रहता और कुछ नहीं।
कुछ जानते हुए उसकी निंदा करना सिर्फ हमारे धर्म में ही होता है देवकुलीक जी और बौद्ध मत का या किसी भी और अवैदिक मत का जन्म बुद्धि और अनुभव जा संघर्ष ही तो हैं।
जब आगम निगम का नाम ही वेद और शास्त्र है जिसकाप्रभाव प्रमुख कारण ही है या तो ध्येय की पूर्ति या तत्व की अनुभूति के कर्म काण्ड है जो भी चार्वाक उसे अनुभव नही करेगा वो यही कहेगा की अगम निगम की जरूरत ही क्या है ।
पर जैसे हर एक संप्रदाय जो ईश्वर प्रेरित नही था उन्होंने किसी न किसी माध्यम से विग्रह की स्थापना की है उन्होंने तो उपासना के नए नियम भी बनाया है जो अगम निगम का सही तरीका नही अपनाते है तो उसीकी निंदा करने के लिए आवश्यक हो तब ही पर ये आवश्यक है जैसे गिलगामेश को अपने हाथों से पूरी वायव्य दिशा को काबिज करना है वैसे ही अपनी भूमिका से महासेन को पूर्व और ईशान्य तथा आग्नेय दिशा में अपना काम और रखना होगा।
गुरुवर्य अब क्या मुझे ये गृहस्थ आश्रम का जीवन छोड़ के कामेडियन बनना है ।
नही महासेन तुम जैसे चाहो पर चार्वाक दर्शन का प्रसार पूर्व की और होना चाहिए ।
में आपका आशीर्वाद रहेगा तो आप जहा चाहो वहा ये कार्य करने के लिए तत्पर रहूंगा गुरुवर्य।
चलो ठीक है अब योगेश्वर तुम्हारी हर पूर्व की योजना में शामिल तो नही होगा हा पर आयोजन में कुछ मदत कर सकता है इसलिए उसे यहां लेके आया था।
ठीक है गुरुवर्य मेरे हाथ में जितना होगा वो हर प्रयास इस कार्य के लिए में कर दूंगा ।
ठीक है महासेन जैसा तुमने कहा है ,व्यवस्था हो गई है।
अब हम प्रस्थान कर लेना चाहिए।
ठीक आहे गुरुजी।
रेणुका माता की जय। अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त। श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा।
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