इंद्र के दो जमाता एक देवसेनापति एक असुराचार्य
राधे राधे वैष्णव आचार्य.
अरे महसेन यहां कैसे आना हुआ। और योगेश्वर कहा है वो तुम्हारे साथ ही था ना।
गिलगामेश अब योगेश्वर को उसका गृहस्थ जीवन प्रारंभ कर देना चाहिए इसलिए तुम्हें हम यहां मिलने आए है।
बोलो ये जिम्मेदारी तुमने क्यों ली
कुछ चीजे सितारों में लिखी होती है, महासेन मुझे यह से तारापीठ जाना है ऐसा चंद्रशेखर जी ने कहा है।
और रामानंद जी कहा है अभी ??
में एक सप्ताह पहले यही मिला था उनसे ।
वो यही एक विरशैव अनुयायी के साथ मुझे यहां ले आए थे ।
आगे तारापीठ से वापस लौट कर कब आना है ?
मुझे अब गृहस्थ आश्रम से तो छुट्टी मिली है महासेन ।
मुझे ये कार्य सोपा गया है की इस भूमि से वरका की भूमि तक वायव्य दिशा , पश्चिम दिशा में हर वनवासी को राज्याभिषेक कराने के बाद वरका में मुझे मुरुगा या महासेन को येजिदी के राज्य का शासक बना के ही मुझे इस पवित्र धरा पर लौटने को कहा गया है।
मेरे नाम से किसी राज्य का शासन जोड़ा जाए ये मेरा सौभाग्य होता गिलगामेश पर मुझे आग्नेय और पूर्व की और चार्वाक नीति और वैदिक धर्म को आधारित बौद्ध मत को प्रचार प्रसार के लिये कार्य करने का आदेश है।
तो मुरुगा ही होगा फिर वो शासक।
अपने संघ की तो जानकारी रखे हुए हो वैशनवाचार्य पर ऐसेही थोड़ी तुम्हे शैब और ब्रम्ह उपासकों से शासन मिल जायेगा तुम्हे आज के समय उनकी भी जानकारी रहनी चाहिए।
अब ये क्या है??
और जो किसी के उपासक नही बनना चाहते उनका क्या करोगे असुर कहते है उनको । भलेहि वो तुम्हारे चंद्रवंश के ही वंश से है पर यूनानी और अर्वो ने उन्हें नया मार्ग और चांद सितारे की भूमि बना दिया है।
आदि वैष्णव प्रल्हाद जी के वंशज और आदि शैव रावण जी के वंशज को शासन से दूर करना मतलब लीला करनी होगी।
किस शासक की बाते कर रहे हो रामानंद जी हर कोई हर वंश से कही न कही शासक बना है , बताओ पद्मनाभ के नंद वंश के आज नाभिक बने है , पांचाली के शासक विश्वकर्मा के कर्म सूतार बने है ।
गोरखा , धीवर, वानर, यही तो शासन करेंगे अगर उनकाही राज्य है तो । बस ऐसी बात है तो शिव जी की आना पड़ेगा नीचे त्रिपुरासुर और अपनेही अनेक अंशो को समाप्त करने के लिए ।
बात तो तुम सही कह रहे हो गिलगामेश पर वैशनवाचार्य होने के नाते तुम इसे भी समझ लो की शिव से बड़ा वैष्णव कोई नही और विष्णु जी के राम स्वरूप से बढ़ा कोई शैव नही । दोनो एक दूसरे के पूरक है तो तुम्हे ये दोनो काम समय के साथ करने है और इस बार भूमि असूरो और असुरों के आचार्य की है भलेही इतिहास में त्रिपुरासुर का वध शिव जी ने किया था पर तारका को समाप्त करने के कुमार का ही संभव होना होता है us समय तुम मुरुगा को याद कर सकते हो क्योंकि वो ही इस समय में देवसेनापति होने के काबिल है ।
तो असुरों के आचार्य का और मुरुगा का इतिहास का संबंध ये था की वो दोनो इंद्र के ही जमाता थे ।
और असुरचार्य से मिली है चंद्र वंश को देवयानी जिनके पुत्र यदु और तुर्वसू के ही वंशज वहा शासन कर रहे है ।
यानी के तुम्हे वानरों में सुग्रीव और दानवों में विभीषण ढूंढने है हर जगह ।
तो तुम्हे राम का भी चयन करना होगा समय के हिसाब से।
इस बार भलेही खुद असुराचार्य अभी अनभिज्ञ है हम पर वक्त गुजार देने से पहले हमे पता होना चाहिए की चंद्रवंशियो को असुरों की भूमि पर असुर वृत्ति से निवृत्ति देने का काम तुम्हे करना है उसके बाद ही सूर्यवंशी या कुशवंशी के बारे में हम कुछ सोच पाएंगे ।
पर चंद्रवंशी ही क्यों, उन्हे क्यों हम प्रथम प्रावधान दे रहे है ।
अभी तक तुमने कुछ समझा है या नहीं पता नही पर तुम्हारा वंश है इसलिए पहला प्रावधान उन्हे मिला ऐसा समझो ।
चंद्रवंशी कोई व्यवस्था नहीं मानते गिलगामेश । उनका तो पहला पुरुष ही चांडाल है , और यादव श्रेष्ठ भी खुद मां के वंश में असुर थे तथा बाणासुर और जम्बूवंत के संबंधी थे ,
देवसेनाप्ति भलेही चंद्रवंश से नही आते हैं पर अपने मामा या मातामह की हम सेवा कर सकते है इसलिए
कुछ येजीदी जो तुम्हारे शहर से है और बीच में कोई कुर्द सूर्यवंशी मिलेंगे जो कुछ हद तक चांद सितारे की पीड़ा से त्रस्त है उन्हे सम्मान और प्रतिष्ठा से राज्याभिषेक करते हुए आगे बढ़ना है और फिर वरका मैं गिलगामेश को प्रस्थापित करके तुम अपने आप को यहां फीर वैश्णवचार्य बना सकते हो।
फिर तारापीठ क्यों जाना है।
अगर देवसेनाप्तिय का इतिहास कुछ और विशेष रीति से जानना चाहते हो तो उनकी माता का वर्णन और आशीर्वाद प्राप्त करकर तुम वो ले सकते हो।
वैसे भवानी , अन्नपूर्णा, दुर्गा , सभी एक ही शक्ति को संतुलित रूप से अलग अलग अनुभूति हुई है।
उनके आशीर्वाद के बिना तुम किसी युद्ध को लेकर निश्चित नही हो सकते ।
भलेही तुम बगलामुखी के क्षेत्र से हो गिलगामेश पर काली के हर रूप का महत्त्व है तो एक गलोल के पत्थर के भांति आगे बढ़ने से पहले थोड़ा पीछे खींच कर तुम्हे गतिमान होकर आगे निकलना है।
रास्तों में तुम्हे अपने हर अनुभव और बुद्धि का उपयोग करने के अवसर मिलेंगे जो तुम्हे साक्षात कबीर जी के साथ होने का एहसास भी देंगे और बाल रूप में कबीर जी वो संभावनाएं दिखाएंगे जो तुम्हे शायद न पता हो ।
और ध्यान रहे जिस बालक को किसी शासन में रुचि न हो सत शासक होगा ये बात तुम्हे याद रहनी चाहिए ।
गलतियां गंभीर परिणामों की जननी न बने इसकी पूरी तरह से शास्वती करते रहना।
राधे राधे।
टिप्पण्या
टिप्पणी पोस्ट करा