आधुनिक काल की व्यवस्था
अरे मैत्रेयी महासेन का पता चला की उसे पूर्व की जाने को कहा है रामानंद जी ने, तुम मिली थी पहले रामानंद जी से ।
नही मैं कुछ वक्त के लिए मेरे माताजी के घर goa गई थी।
ठीक है अभी सामने हो तो बताओ मैत्रेई भैरव जी से कब मिली या आखिरी बातचीत हुई।
जब घर पर थी तब ही आखिरी बार, कुछ एक माह पूर्व।
किसी नई व्यव्स्था के बारे जानकारी मिली है तुम्हे।
नही इस तरह की कोई बात नही हुई।
किसी capacity planning की बात हो रही थी।
हा महाराज aap को कैसे पता ।
कुछ विकास को गति देने के लिए हम भी ग्राहक होते है तो हम ही हैं जो ये चाहते हैं की किसी तरह इस मायाजाल को संभाल कर इस से होने वाली वैयक्तिक हानि और सामूहिक हानि से भारतीयों को और फिर हम से समर्पित लोगो को बचाना हमारा कर्तव्य हम समझते हैं।
ये किस मायाजाल की बात हो रही है रामानंद जी।
तुम कही प्रत्यक्ष पहुंचने से पहले तुम्हारा क्या पहुंचता है गिलगामेश?
मेरा नाम, मेरा काम , मेरा संदेश , मेरी जानकारी , मेरे अगले काम की बात बहुत कुछ महाराज जी ।
उसे ही एक काले डिब्बे में तुमने डाला है वो क्या बोलते हो तुम internetwork, समझ गया गुरुवर्य ।
तो भैरव जी इस पर क्या काम कर रहे हैं गुरुवर्य।
वो क्या कर रहा है ये तो वो हो जाने पर हम क्या चाहते है और तुम को भी इस की आवश्यकता होगी इसलिए सुनो ।
हम चाहते हैं की किसी भी व्यक्ति के हात में जो ये मोबाइल होता है उसे इस बारीकी तक नियंत्रित किया जाए की हर एक व्यक्ति को कब तक एक ही संसाधन उपयोग में लाना है और हर एक का दैनिक क्रम , कुछ अनावर्त या आवर्त स्थिति जो दिनचर्या से विपरीत हो।
और इस हिसाब से कुछ निष्पक्ष नियंत्रण करने वाले लोगों को इस तरह के काम लिए आवश्यक सामग्री और अधिकारो के साथ हम अपने यहां रखना चाहते है।
याद रहे गिलगामेश, कोई भी वैष्णव शिष्य युद्ध से नही बच पाएगा पर कुछ हद तक तैयारी शुरू कर दो की प्रत्यक्ष रूप से सिर्फ कुछ शिष्यों की आवश्यकता हो और स्थानीय लोगों से मदद मिलती रहे इसलिए हर भारतीय राजदूत को अपने साथ लेकर चलने से समय का सही उपयोग करने में सफल होंगे।
कुछ जगह एक से ज्यादा या एक से ज्यादा जगह एक ही राजदूत की आवश्यकता होगी।
इसलिए शेष नियोजन और नीति में तुम्हारे हात में सोपता हु।
जी गुरुवर्य जैसा आपको सही लगे। वैसे में योगेश्वर के साथ public relations सीखा तो हु लेकिन उसका इतना बड़ा उपयोग मेने सोचा नहीं थ
ठीक है।
और कुछ है जो maitreyi ही बता सकती हैं।
इस काम के साथ धर्म अर्थ और अन्न वस्त्र निवारा की भी जरूरत है वैसे जहा तक साथ रहे चंद्रशेखर और मुरुगा उपाय करें पर मैत्रेई यहां वृंदावन में रह कर तुम्हे हर समय हर चीज को लेकर निश्चित रूप से ध्यान देगी।
ठीक है गुरुवर्य।
या फिर maitreyi खुद सोचेगी कि वो कहा रहेगी पर उसका योगदान तो तय हुआ है।
ध्यान रहे मैत्रेई गिलगामेश का प्रवास एक युद्ध के अश्व या हाथी की तरह है और महासेन जिस प्रकार प्रवास करेगा वो एक निरूपद्रवी पर कर्मप्रधान प्राणी जैसा है दोनो को हर समय हर आवश्यक सामग्री मिलती रहे ।
तुम चाहो तो महासेन के साथ रहना ताकि में और योगेश्वर भारत में सबसे जो मिले हुए आवश्यक सामग्री और संसाधन है वो पहुंचा पाएंगे ।
वैसे मेने योगेश्वर से भी बात कर ली है।
ठीक है गुरुवर्य में नियोजित समय पर अपना योगदान दूंगी और पूरा ध्यान रखूंगी हर प्रयास से ये दोनो प्रवास ठीक से से और निश्चित ध्येय प्राप्त हेतु पूर्ण रूप धारण करें।
फिर एक बार समझ लो की इस समय हर देश की शासन व्यवस्था राजाओं के है में नही है कुछ जगह सामंत ही राजा है और नियंत्रण करने के हर प्राप्त अवसर उन्होंने उपयोग में लाए है ये दोनो दिशाओं की बात है।
वैश्य कुछ हद तक तुम्हे साथ देंगे अगर उन्हे कुछ फायदा होगा तो ।
हर शुद्र अपने जीवन और अपने परिवार को जो चाहिए उसके लिए अपनी जिंदगी गुजार रहा है ।
और ब्राम्हण अपने अपने गुट बना कर या तो वाम मार्ग या मोक्ष मार्ग के लिए अपने समर्पित लोगो के साथ कनेक्ट है।
पर दोनो कुछ हद तक उदासीन है ।
वाम मार्ग तुम्हारे लिए कम है गिलगामेश पर मोक्ष मार्ग की परिभाषा चांद सितारे वाले हर देश में यहां से अलग है ।
महासेन भीषण युद्ध की परिस्थिति में भी तुम्हे किसी को भी युद्ध का आवाहन नही करना है जब तक गिलगामेश उसकी आखिरी लड़ाई जीत न जाए।
क्योंकि अव्यवस्थित चंद्रवंश और सूर्यवंश को एक बार संभाला जा सकता है लेकिन अंत की गहरी नदी की तरह शांत बौद्ध मत को सिर्फ शास्त्रार्थ, योग , तंत्र इन्ही से जीता जा सकता है।
अगर गिलगामेश खुद वहा योग के लिए आ सके तो बेस्ट पर वो नहीं आए तो हम ही आयेंगे वहा पर युद्ध जमीन पर ना हो इसकी पूरी कोशिश, वैसेभी पूर्व तो प्रकाशमान है पश्चिम को गर्मी की जरुरत है।
शुभकामनाए और यशस्वी भव।
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