जब तक युद्ध होगा तुम्हे संसार नही बसाना है

बोलो मॅक्स , मेरे साथ तारा पीठ चलोगे.
मेरे लिये तो अभी बहुत कूछ निभाना और कमाना बाकी है ऐसा नहीं लगता गुरुवर्य।
और मेरे हिसाब से मेरे दादाजी भगत सिंह और नाना जी 
नामदेव  जी के साथ इसी प्रांत में नरसी से घुमान तक ही मेरा काम है।
आप को वैष्णव गुरु बनाया गया है।

अब मुझे गुरु के नाते यह बताए कि एक माता और पिता में कौन ये ज्यादातर बोल सकता है की ये संतान मेरी नहीं है !

कबीर ये सवाल तुम्हारे मन में क्यू आया है ?
क्योकी ये जाणणा चाहता है की तुम ऐसे प्रश्र्नो को स्वीकार कर के इस्का तोड बता सको .
आप कब आये ,धन्यवाद गुरवर्य. कबीर ये रामानंद जी है उन्होंने ही मेरा चूनाव किया है.
मतलब हम सही गलत के बिना is प्रश्न को कैसे समधान करोगे वैष्णव आचार्य?

ज्यादातर  पिता ने अपने पुत्र को नकार या पिडा का दान दिया है .
सूर्य ने छायापुत्र शनी को , शिव जी ने गणेश को , हिरण्याक्षिपू ने प्रल्हाद को , दुष्यंत ने शकुंतला पुत्र भरत को, 
यह तक प्रथम दर्शी लाव कुश को राम जी ने क्या ये तुम्हे सही लगता है कबीर .

तो आप ये कह रहे हो की माता कभी अपने पुत्र को दूर नाही करती आचार्य .
यह भी सही नहीं है , गंगा ने अपने 8 पुत्र , कुंती ने कर्ण को , प्रन या मान्यता के चलते स्वीकार नहीं किया.

मान्यता का मतलब क्या आचार्य?
कुमारी कभी समाजमान्य माता नहीं होती कबीर.

पर हमारी मेरी माता तो कुमारी ही थी आचार्य ,
अब तुम मॅक्स जैसे बाते कर रहे हो ,
कबीर ठीक है उसे आपद्धर्म कहा गया है जब मेरी माता कुमारी थी तभी यहा भारत में भी सातवाहन नं के वंश में शको का वध करणे वाला शालिवाहन एक कुमारी माता का पुत्र ही था .

परशुराम ने जब क्षत्रियो के हेहाय तथा सहस्तरबहू अर्जुन को वंशहिन करना चाहा तब हिंगलाज माता तथा अन्य अनेक माता ने वंश को चालू रख पृथ्वी को बचा लिया.
ये तो सिर्फ एक सवाल है अब ऐसे अनोको प्रश्न तुम्हे मिलेंगे गिलगमेश ये नन्हा कबीर तुम्हे कहा मिला , ये मेरे एक प्रिय व्यक्ती का पुत्र है गुरुवर्य .
ये यहा तुम्हे मिलने आया है या कुछ अलग.
ये अपने दादा भगत सिंह के साथ यह जगह से अपने नानिहाल जा रहा था बीच में गाडी रोक के यह जगाह रुक गये है.
वाणी में कुत्तूहल हो कबीर पर कही बार अपने अतीत को छोड देना चाहिए.
जो तूमने प्रश्न पूछा है वो बिना तुम्हारा अनुभव किये तुम्हे नहीं आया है.
जरा अपने ओर से बोलो ये तुमने क्यों पूछा ।
मेरी मां और पिता के कुछ ऐसे संभाषण मैने सुने थे जो मुझे ये प्रश्न के उत्तर पता लगाने के लिए उकसाते थे।
अब वो दोनो अगर नहीं हैं। तो मैं एक स्वतंत्रता महसूस करता हूं।
किंतु ये स्वतंत्रता को जग ने अनाथ का नाम दिया है।
इस स्वतंत्रता का उपयोग तुम साधना , ब्रम्हचर्य के लिए कर सकते हो कबीर ।
याद रहे चाहो तो तुम संसार में रिश्ते बनाकर ही एक जटिल समाज का हिस्सा बन सकते  हो जिसे वंश कहते है ।
ये चंद्र और सूर्य के भी बन गए है और अनेकों सभ्यताओं में अनेकों वंश है ।

और गिलगामेश तो वरका का राजा था तो तुम वह राजा के वंश से भी जुड़ सकते हो क्यों Gilgamesh  ।
गुरुवर्य में तो नामधारी ही हु असली गिलगामेश आप मुझसे ज्यादा जानकारी रखते हैं।
तो युद्ध का मुख्य कारण इसी से जन्म लेता है क्या ??
नहीं ऐसा हमेशा जरूरी नहीं ।

कही छल कपट से या कही चल कपट का विरोध करने के लिए युद्ध होते है ।
किसी ऐसी चीज के लिए जिसकी मात्रा परिपूर्ण हो उसे अपने वश में रखने के लिए या किसी अपूर्ण संसाधन की रक्षा के लिए युद्ध होते है।
वंश का युद्ध में क्या होता है ।
सर्व नाश !!!
फिर लोग यहां कैसे हर तरह से एक हो सकते है ।
समाज के लिए दो सभ्यताओं ने दो माध्यम दिए है कबीर ।
जो मुझे किसी वृत्तपत्र में लिखे हुए मिले थे ।
एक पश्चिमी विचार है जिसे molten पॉट या ऐसी रेसिपी जहां सबका अस्तित्व खत्म होके एक नया समाज बनेगा ये मानते है।
इसके विपरीत हमारे कृष्ण जी का काला या सब्जियों का सलाद जो हमारे भारत की भूमि से बनाया गया विचार है जो है कि हर एक का स्वतंत्र अस्तित्व है और हमको एक दूसरे के लिए आवश्यक बनना है नकी एक दूसरे को खत्म करना है ।
पर भेदभाव तो हर जगह दिखता है ।
वहीं तुम्हारे लिए व्यवस्था बनाता है कबीर । बिना भेदभाव के कोई समाज नहीं बनता ।

हर समाज में हर एक का अहंकार भेदभाव बनाता है।
यही सांख्य का नियम हर जगह लागू होता है ।
कोण अच्छा होता है ??
जो तुम्हारे पास होकर तुम्हारे अहंकार को पूर्ण से स्वीकार करता है। पर कुछ समय बाद तुम्हारे अहंकार को ठेस पहुंची पर उसका साथ नहीं हो तो वो याद आए तो समझ लेना वो अच्छा था।

कोण अच्छा नहीं होता ??
जो हर वक्त तुम्हे पानी में देखता हो वो या तो तुम्हारा स्पर्धक या तुम्हारा शत्रु कहलाता है।

मीठी छुरी से घर के भेदी बन जाते है। और किसी के शाप से वंश का युद्ध भूमि पर निर्वाण होता है।

तो किसी ऋषि के शाप से वंश का पूर्ण नाश शक्य है ।
नहीं पर हम याद किसे रखते है कबीर । हम सिर्फ उनको याद करते है जो आदर्श हो ।
आज के समय में हम कौनसे आदर्श रखते हैं।

किसी देश में लोककला से भांड आदर्श बनते है पर वो सोंग करते है सच में वो देव या नायक नहीं होते ।
पर इसी वजह से भांडों में ओर भगवान में अन्तर भूल जाते है।
और भगवान को भी भांडों की तरह देखने लगते है ।

उसी देश में शिक्षा, रक्षा , व्यापार और सेवा के लिए जो आदर्श बनेंगे उन्हें ही बृहस्पति, सूर्य, इंद्र, गरुड़ की उपमा दी जाती है।

वो हमारे स्वस्ति श्लोक में कहा गया है।

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
अर्थ - महती कीर्ति वाले ऐश्वर्यशाली इन्द्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण है, सबके पोषणकर्ता वे पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई रोक नहीं सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। वेदवाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
अगर हमारे आदर्श खोखले कर दिए जाएं तो हम उनकी उपासना पद्धति को स्वीकार करेंगे ऐसा सोच कर गजवा ए हिंद के लिए अनेकों आक्रमणकारी यहां आए और भूल गए कि वह इस भूमि पर आते ही इस कृष्ण के काले का या सलाद का पार्ट हो जाते है।

तो आप ये कहना चाहते है कि जो चल रहा है वो सही चल रहा है।
ऐसा भी पूर्ण रूप से सही नहीं है कबीर ।
कृष्ण जी ने या राम जी ने या शिव जी ने जो युद्ध लड़े वो सभ्यता को बचाने के लिए लड़े गए थे ।
तो हम ये कह सकते है कि हर युद्ध को भविष्य में इतिहास लिखने वालों को जब न्याय्य बताना होगा तो वो अभी के शासकों से जुड़े हुए थे वहीं नायक बांधेगा ।
और कुछ गिने चुने ही होंगे जो वैकल्पिक नायक होंगे ।
उनका वंश न होगा न उनका कोई धर्म होगा वो हर उपासना पद्धति में मान्य होगा।
एक नाम बोलते है केमल पाशा नामक एक नायक नाइट ऑफ अरेबिया कादंबरी में शामिल है।
उसी तरह हमारे हर पुराण में अनेकों नायक है।
और कलियुग में ही हर पुराण और वेदों को संकलित किया और जनमेजय के कहने पर ही जय ग्रन्थ से महाभारत का नायक अर्जुन बन गया  क्योंकि जनमेजय ही अर्जुन का पौत्र था।
आगे भागवत में अनेक वंश का उल्लेख आता है जो पितृ दोष के निवारण करने के लिए समर्थ है ।
तो युद्ध से पहले हम ये जो संभाषण कर रहे है उसमें मेरा योगदान क्या होना चाहिए ।
में भारत भूमि  में तथा नरसी या घुमान में रहना चाहूंगा ।
कबीर मुझे अच्छा लगा कि तुम क्रिश्चियन होते हुए भी भक्ति संप्रदाय के नामदेव जी के वंश से या गांव से जुड़े हुए हो और तुम्हे वहां ही रहके संसार का अनुमान लगाना है ।
तुम्हे इसी समय हम ज्यादा कुछ मांग भी नहीं पाएंगे पर चंद्रवंशी यदु और तुर्वसू की भूमि में में किसी स्कंद को जाना था वो हमारे सामने है ।
वज्रयान बुद्ध के भूमि में वरद गणेश को जाना था वो काम महासेन और मैत्रेई करेंगे ।
एक भारत के लिए योगेश्वर जगन्नाथ की भूमिका में  है और  अगर जरूरत पड़े तो दक्षिण और शंखद्वीप जो सूर्यवंशियों का माना जाता है वहां अगर ये स्कंद गिलगामेश समय पर न पहुंचे तब मुरुगन तंजावर से कन्याकुमारी और आबुधाबी से पूरे शंखद्वीप का कार्य शुरू करेगा ।
गिलगामेश तुम्हे हर समय हर जगह अकेले जाना होगा ऐसी परिस्थिति तैयार होगई है ।
तुम्हे 5 साल से ज्यादा समय नहीं लगना चाहिए क्योंकि शंखद्वीप में एक तप की लड़ाई होने की संभावना है भारत का शताब्दी तुम्हे फिर से यहां आना है ।
कुछ समय का अनुभव आपसे पूछताछ करने का मन करता हैं अपने चंद्र शेखर का नाम नहीं लिया गुरुवर्य ।
मैने अपना भी नाम नहीं लिया गिलगामेश कुछ चीजे सितारों में लिखी होती हैं ना तुम न मै न ये धरा वो बदल सकती है ।
जब तुम आओगे तो तुम कबीर से मिलो और कबीर को वही व्यास जी वाला कम दो संकलन का ।
अब से 17 वर्ष बाद कबीर भी एक लेखक बना होगा ।
और मेरे लिए आवश्यक सामग्री यहां रखके जाना मुलाकात सितारे तय करेंगे ।
और जाने से पहले बता देने की हम पूरी कोशिश करेंगे।
आपसे मिली ये विद्या और सब कुछ हमे हमेशा याद रहेंगी गुरुवर्य रामानंदजी ।
वैष्णव आचार्य में आपकी प्रतिक्षा करूंगा ।
जय जय महाकाल ।
जय जय सीताराम ।

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