युद्ध का असर मंगलमय हो
गुरुवर्य मुझमें ऐसा क्या है जो कबीर जैसे बालक और योगेश्वर , महासेन जैसे युवकों में नहीं है।
वो मंगल है वत्स , मंगल का काम है युद्ध और बुध का काम है व्यवहार । तो तुम में और महासेन में जो फरक है वो तुम समझ गए होंगे
और राहु के बिना समुद्रलांघन नहीं हो सकता इसलिए कबीर जो अभी बालक है और योगेश्वर जो अभी एक राजा बन चुका है दोनो के लिए राहु केतु एक ही दिशा में है और वहां दो रस्ते होते है क्योंकि योगेश्वर तुम्हारा अनुयाई या तुम्हारा शिष्य था तो वो भोगविलास राजा बन गया है ।
कबीर आगे मैत्रेई और महासेन से मिलेगा क्योंकि दोनों की मातृभूमि या जुड़ाव इस दख्खन से है ।तो कबीर धर्मविलासी पंडित बनेगा । और जब तक तुम लौट आओगे योगेश्वर राजा है और महासेन के जाने के बाद और आने तक कबीर राजगुरु या अर्थशास्त्री बनेगा ।
तो यह भूमि में तुम जो कुछ भी करना चाहते थे उसकी नींव तुमने रख ली है।
गुरुवर्य निसंदेह आप जो कह रहे है वो सभी सही हो लेकिन एक शंका से मुझे बाहर निकालने की सहायता करे कि यातकिंचित भी संधि के कारण अगर में न रहा तो क्या होगा ।
अपना कर्म किए बिना कोई भी तुम्हे न बुलाता है नहीं जाने देता है गिलगामेश ।
जो तुम्हारी शंका है उसपर अगर तुम कोई कटु वाक्य सुनना चाहते हो तो सुनो या तो तुम या चंद्रशेखर दोनों ने से एक वापस आएगा और मुरुगा समय का प्रतिनिधित्व कर रहा है वैसे उसे समुद्र लांघन का योग नहीं है पर तुम दोनों मैसे एक के जाने के बाद और देश काल पात्र के अनुसार और सिर्फ सूर्यवंशियों के राज्य में वो जा सकता है ।
तो मैं ये मान लू की तुम मेरे बिना ये सब कर लोगे ठीक है गिलगामेश।
मुझे कोई और मार्ग हो तो बताए गुरुवर्य ।
यहां तक तुम लाए गए हो ये तो तुम मानते हो या नहीं गिलगामेश ।
हा गुरुवर्य !!
तुम कुमारसंभवम का पाठ एक बार कर लो तो तुम्हे पता चले कि कुमार को ही तारकासुर से लड़ना पड़ा नहीं शिव लड़े न कोई और ।
कुमार के आने तक सब राह ही देखते रहे ।
ऐसीही अनेकों वनवासी राजपुत्रों को तुम्हारी आस है गिलगामेश आशा करता हु के तुम उन्हें मिल के उनके साथ ये कार्य पूर्ण करोगे ।
और कुछ आप बताना चाहेंगे गुरुवर्य , जो मेरे काम में सहायता करे ।
मुझे लगता है कि तुम व्यवस्था और तकनीक दोनों के बारे में जानकारी रखते हो गिलगामेश अगर है तो सम्मति देना।
कुछ कुछ जानता हु गुरुवर्य ।
तो ये समझ लो कि डिफेंस या रक्षा का सिस्टम होता है या व्यवस्था होनी चाहिए और तुमने चक्रव्यूह जैसे कही व्यूह सुने होंगे वो रक्षा की संरचनाएं होती थी वो सिस्टम या व्यवस्था का हिस्सा है।
और अटैक या आक्रमण का तकनीकी या technique होता है । तुमने गनिमी कावा या गोरिला वारफेयर सुना होगा जहां ठाकुर पढ़ाता था उस भूमि से ये बात निकली है।
और शस्त्र, अस्त्र, सेना ये संसाधन है जो मापे जाते है गिने जाते है ।और उससे शक्ति का प्रदर्शन अगर जीते हो तो या उपयोग अगर युद्ध में हो तो गिन चुन के ही करना ।
रही बात फितूर और हेरो जासूसों की , तो जासूस और फितूर इनमें सिर्फ निष्ठा और समर्पण का फर्क होता है , जासूस तुम्हारे समर्पण में है और फितूर शत्रु को समर्पित होते है।
कुछ समय तक तुम्हे मिलने की आवश्यकता हो तो मिलने आ सकते हो तारापीठ से निकल कर तुम्हे सीधा रास्ता मिले तो ठीक नहीं तो अभी के मित्र भूटान से निकल कर आगे बढ़ो।
औपचारिकता को पूरा ध्यान में रखते हुए जाना , कही भी कोई संदेह या समयसूचकता का अभाव न हो , जब तक रहेंगे संदेश भेजेंगे यहां की चिंता न करना जैसे अभी मेने बताया ।
कुमार को मोह और चिंता कभी शोभा नहीं देगी और निस्वार्थ भाव रखना क्योंकि विजय तुम्हारी नहीं वनवासियों की होगी और हार तुम्हारी होगी , ध्यान रहे शत्रु एक बार जीतेगा पर तुम्हे हर बार जितना है , और पश्चिम ही युद्ध का मैदान रहे किसी भी प्रकार से पूर्व में चल रही परंपरा या व्यवस्था को न खींचना है न हानि हो।
उसके ऊपर महासेन का व्यवहारचातुर्य और वरद गणेश का सम्मोहन आश्रित है ऐसा समझो ।
दाम और दंड ठीक रहेंगे साम और भेद के साथ वहां कम नहीं होगा ।
भेद सिर्फ वहां उपयोग होगा जहां राजा अत्यंत प्रबल हो पर वनवासी उसका संबंधी ही हो। जनता को अपने लिए नया राजा आवश्यक लगे ।
किसी भी हालात में तह को दाम नीति में बदले ।
यशस्वी भव ।।
धन्यवाद् गुरुवर्य।
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