काफ़िर बंकर तक पहुँच गए हैं!

 

काफ़िर बंकर तक पहुँच गए हैं!

पाशा, जो शजाद का एक वफादार मातहत था, दौड़ता हुआ शजाद के पास आया। उसके चेहरे पर चिंता और घबराहट साफ दिख रही थी। "शजाद भाई, काफ़िर हमारे बंकर तक पहुँच गए हैं!" पाशा ने हाँफते हुए कहा, उसकी आवाज़ में डर साफ झलक रहा था।

शजाद ने तुरंत अपनी दूरबीन उठाई और बंकर की दिशा में देखा। उसकी आँखें चौड़ी हो गईं। उसने देखा कि उसकी कार में, जो बंकर के पास खड़ी थी, अली बैठा था। अली अकेला नहीं था; उसके साथ उसकी पत्नी और प्रह्लाद भी थे। यह देखकर शजाद के दिल में एक अजीब सी हलचल हुई। यह कैसा विरोधाभास था! जिन काफ़िरों से वे अपनी रक्षा कर रहे थे, उनमें उसका अपना ही बेटा अली, अपनी पत्नी और प्रह्लाद के साथ मौजूद था।

यह एक ऐसा क्षण था जिसने शजाद को भीतर तक हिला दिया। दुश्मन के रूप में देखे जा रहे लोगों में उसके अपने परिवार का होना, यह स्थिति उसकी सारी धारणाओं को चुनौती दे रही थी। पाशा की घबराहट और उसकी अपनी आँखों देखी सच्चाई, दोनों ने मिलकर शजाद को एक गहरे असमंजस में डाल दिया था।

पाशा: (अभी भी हाँफ रहा है, आँखें फटी हुई) शजाद भाई! यह... यह कैसे हो सकता है? अली बेटा... वह उनके साथ है? यह तो हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा है!

शजाद: (उसकी आवाज़ में अविश्वसनीय रूप से शांति है, लेकिन आँखें गहरी सोच में डूबी हैं) पाशा, शांत हो जाओ। मैंने अपनी आँखों से देखा है। अली, उसकी पत्नी और प्रह्लाद... वे कार में हैं। यह हमारी सोच से कहीं ज़्यादा जटिल है।

पाशा: जटिल? यह तो धोखा है! वह काफ़िरों से मिला हुआ है! हमें... हमें कुछ करना होगा! क्या हमें उन पर हमला करना चाहिए?

शजाद: (धीरे से सिर हिलाता है) हमला? उन पर जिनमें मेरा अपना बेटा है? क्या तुम सच में ऐसा कह रहे हो? हम ऐसे में कैसे हमला कर सकते हैं? हमारी अपनी औलाद है वहाँ!

पाशा: (हताशा में हाथ मलते हुए) लेकिन, अगर वह उनकी तरफ है तो? वह हमारे सारे भेद खोल सकता है। हमारे बंकर की सारी जानकारी उन्हें दे सकता है! वह हमारी कमज़ोरी बन गया है!

शजाद: (आँखों में एक अजीब सी चमक आती है, जैसे उसने कोई नया रास्ता देखा हो) नहीं, पाशा। वह हमारी कमज़ोरी नहीं है। वह... वह हमारा रास्ता भी हो सकता है। हमें यह समझने की ज़रूरत है कि वह वहाँ क्यों है। हमें सीधे हमले के बजाय, कुछ और सोचना होगा।

पाशा: (भ्रमित) कुछ और? क्या मतलब? इस स्थिति में और क्या सोचा जा सकता है? काफ़िर बंकर तक पहुँच गए हैं!

शजाद: (धीरे से खड़ा होता है, दूरबीन अभी भी हाथ में है) इसका मतलब है कि हमें अब रणनीति बदलनी होगी। अली वहाँ है, यह एक संकेत है। या तो वह बंधक है, या... या यह कुछ और है जिसे हमें समझना होगा। हमें सीधे टकराव से बचना होगा, कम से कम अभी तो। हमें अली तक पहुँचने का कोई रास्ता खोजना होगा।

पाशा: (अभी भी संशय में) और अगर वह जानबूझकर उनके साथ हो? अगर उसने हमें धोखा दिया हो?

शजाद: (लम्बी साँस लेता है) तो भी, पाशा। वह मेरा बेटा है। और मैं यह सच जाने बिना कोई कदम नहीं उठाऊँगा। हमें इंतज़ार करना होगा। हमें देखना होगा कि उनका अगला कदम क्या है। और तब तक, कोई भी हमला नहीं करेगा। हमारी प्राथमिकता अली और उसके परिवार की सुरक्षा है, भले ही इस समय परिस्थितियाँ कितनी भी विकट क्यों न लगें।

शजाद और पाशा के बीच गंभीर बातचीत चल ही रही थी कि दूरबीन से बंकर के पास का नज़ारा अचानक बदल गया। कार का दरवाज़ा खुला और अली बाहर निकला। उसके चेहरे पर कोई आक्रामकता नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी उदासी और बेचैनी थी। उसने अपने हाथ ऊपर उठाए, शांति का संकेत देते हुए, और अपनी आवाज़ को यथासंभव ऊँचा उठाते हुए चिल्लाया, ताकि बंकर तक उसकी बात पहुँच सके:

अली: (आँखों में उम्मीद और दर्द का मिश्रण लिए) "पिताजी! हम... हम बस आपसे मिलना चाहते हैं! हम यहाँ लड़ने नहीं आए हैं! हम बस आपसे बात करना चाहते हैं!"

यह सुनकर बंकर में एक सन्नाटा छा गया। शजाद, जो दूरबीन से सब देख रहा था, पत्थर बन गया। अली की आवाज़, उसमें छिपा दर्द और मिलने की चाहत, सीधे उसके दिल में उतर गई। पाशा भी चौंक गया। "शजाद भाई, यह क्या...?" वह कुछ और कह पाता, इससे पहले ही शजाद ने उसे हाथ के इशारे से रोक दिया।

शजाद के दिमाग में तूफान चल रहा था। क्या अली सच कह रहा है? क्या यह दुश्मनों की कोई चाल है? या वाकई उसका बेटा, जिसे वह काफ़िरों के साथ देखकर हैरान था, बस अपने पिता से मिलने आया है? उसकी पत्नी और प्रह्लाद भी उसके साथ थे, जो इस बात को और अधिक विश्वसनीय बना रहा था कि यह कोई सैन्य चाल नहीं, बल्कि व्यक्तिगत मुलाक़ात की इच्छा थी।

शजाद: (धीमी, लगभग बुदबुदाती आवाज़ में पाशा से) "तुमने सुना पाशा? वह सिर्फ़ मुझसे मिलना चाहता है। यह कोई हमला नहीं है।"

पाशा: (अभी भी संदेह में) "लेकिन शजाद भाई, हम उन पर कैसे भरोसा कर सकते हैं? यह सब एक चाल भी हो सकती है। वे हमें बाहर खींचने की कोशिश कर रहे हों।"

शजाद: (दृढ़ता से, लेकिन भीतर से व्याकुल) "नहीं। एक बेटा अपने पिता से मिलने के लिए इस तरह नहीं आता अगर उसे लड़ने का इरादा हो। उसकी आवाज़ में... दर्द था। मैं यह जोखिम उठाऊँगा।"

शजाद ने गहरी साँस ली। वह जानता था कि यह एक अत्यंत जोखिम भरा निर्णय हो सकता है। लेकिन एक पिता के नाते, वह अपने बेटे की पुकार को अनसुना नहीं कर सकता था। उसे यह समझना था कि अली वहाँ क्यों है, और क्यों वह अपने परिवार के साथ इस खतरे भरे इलाके में आया है।

शजाद: (बंकर के दूसरे साथियों को आदेश देते हुए) "कोई भी फायर नहीं करेगा! अपनी पोजीशन पर रहो, लेकिन कोई हरकत नहीं करेगा। पाशा, तुम मेरे साथ आओगे। हमें उनसे बात करनी होगी।"

पाशा अभी भी असमंजस में था, लेकिन उसने अपने नेता के आदेश का पालन किया। शजाद ने हथियार नहीं उठाया, बल्कि अपनी दूरबीन को नीचे रखा और बंकर के मुख्य द्वार की ओर बढ़ा। उसके मन में उम्मीद, डर और अनिश्चितता का द्वंद्व चल रहा था। एक पिता और एक नेता के रूप में, उसे अब सबसे मुश्किल निर्णय का सामना करना था: अपने बेटे पर भरोसा करना, भले ही वह दुश्मन की ओर से आया हो।


शजाद जैसे ही बंकर से बाहर निकला और अली, उसकी पत्नी, और प्रह्लाद के करीब पहुँचा, उसकी आँखें अचानक प्रह्लाद पर टिकीं। एक पल के लिए समय थम सा गया। शजाद के चेहरे पर आश्चर्य और फिर एक धुँधली सी याद की चमक उभरी।

"प्रह्लाद...?" शजाद ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा, उसकी आवाज़ में अविश्वास था।

प्रह्लाद, जो अब तक शांत खड़ा था, शजाद को देखकर मुस्कुराया, एक ऐसी मुस्कान जिसमें पुरानी यादें और वर्तमान की विडंबना दोनों थीं। "शजाद! मुझे पता था कि तुम मुझे पहचान जाओगे।"

यह सुनते ही शजाद के दिमाग में पुरानी यादें ताज़ा हो गईं, जैसे कोई पुरानी फ़िल्म चल रही हो। पाशा, जो उनके पीछे खड़ा था, कुछ समझ नहीं पा रहा था।

"तुम... तुम यहाँ?" शजाद ने पूछा, उसका ध्यान अब पूरी तरह से प्रह्लाद पर था, अली और उसकी पत्नी पर नहीं।

प्रह्लाद: "दुनिया बहुत छोटी है शजाद। और देखो, नियति ने हमें फिर कहाँ लाकर खड़ा कर दिया।"

शजाद को याद आया विश्वविद्यालय का वह दौर। प्रह्लाद, उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी। अकादमिक उत्कृष्टता से लेकर खेल के मैदान तक, वे हमेशा एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में रहते थे। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में उनके बीच तीखी बहसें होती थीं, जिनके दर्शक भी मंत्रमुग्ध रह जाते थे। दोनों ही बेहद प्रतिभाशाली और अपने-अपने सिद्धांतों पर अडिग थे।

"तो यह तुम थे," शजाद ने कहा, एक पुरानी टीस और कुछ सम्मान का मिश्रण उसकी आवाज़ में था। "मैंने सोचा था कि तुम कहीं और अपनी दुनिया बना चुके होगे।"

प्रह्लाद: (आँखों में चमक के साथ) "और मैंने सोचा था कि तुम अपने आदर्शों में इतने गहरे डूब चुके होगे कि तुम्हें किसी और चीज़ की परवाह ही नहीं होगी।"

उनकी इस पुरानी पहचान ने माहौल में एक अजीब सा मोड़ ला दिया था। दुश्मनी और अविश्वास के बीच, विश्वविद्यालय के दिनों की एक परत अचानक से उभर आई थी। पाशा को यह सब देखकर बेहद हैरानी हो रही थी। उसके शजाद भाई, जो हमेशा गंभीर और दृढ़ रहते थे, अचानक से एक पुराने दोस्त, या यों कहें कि एक पुराने प्रतिद्वंद्वी से मिल रहे थे।

"लेकिन तुम... तुम इनके साथ क्यों हो?" शजाद ने अपनी पुरानी प्रतिद्वंद्विता को किनारे रखते हुए, सीधे मुद्दे पर आने की कोशिश की।

प्रह्लाद: (गंभीर होकर) "यह एक लंबी कहानी है शजाद। लेकिन विश्वास करो, मैं यहाँ किसी लड़ाई के लिए नहीं हूँ। हम सब सिर्फ़ एक पुल बनाना चाहते हैं, न कि दीवारों को और ऊँचा करना।"

अली और उसकी पत्नी शांत खड़े थे, इस पुरानी कहानी को सुनते हुए। यह स्पष्ट था कि प्रह्लाद का वहाँ होना सिर्फ़ एक संयोग नहीं था, बल्कि इस पूरी स्थिति में उसकी भी एक भूमिका थी। शजाद के मन में अब और भी सवाल थे, लेकिन एक बात साफ थी: प्रह्लाद की उपस्थिति ने इस टकराव को एक व्यक्तिगत और अप्रत्याशित आयाम दे दिया था, जिसे केवल सैन्य रणनीति से नहीं सुलझाया जा सकता था।

शाहज़ाद के बंकर की हवा में नम मिट्टी, बासी कॉफ़ी और हथियारों की धातव गंध घुली हुई थी। ज़मीन के नीचे, बाग़ी कैंप का आम शोर-गुल – दूर की चीख़ें, साज़ो-सामान की खड़खड़ाहट, जनरेटरों की धीमी गूँज – एक हल्की थिरकन में दब गई थी जो मिट्टी की दीवारों से होती हुई महसूस हो रही थी। नालीदार लोहे की छत से लटका एक नंगा, अकेला बल्ब एक खुरदुरे लकड़ी के मेज़ पर कठोर, बेदर्द रोशनी बिखेर रहा था, जो नक्शों, रेखाचित्रों और एक पुराने, टूटे-फूटे रेडियो से निकलती सरसराहट से अटा पड़ा था।

शाहज़ाद, जिनके चेहरे पर अनगिनत बेख़ाब रातों और भारी बोझ की लकीरें खिंची थीं, एक फीके नक्शे पर एक समोच्च रेखा पर उंगली फेर रहे थे। उनकी सामान्य विश्लेषणात्मक नज़रें, जो अक्सर धर्मग्रंथों या दर्शनशास्त्र पर टिकी रहती थीं, अब सिकुड़ गई थीं, ज़मीन के भूभाग का विश्लेषण कर रही थीं। उन्होंने सादे, व्यावहारिक फ़ौजी कपड़े पहने हुए थे, जो उनके कभी पसंदीदा विद्वत्तापूर्ण लिबास के बिल्कुल विपरीत थे।

उनके सामने, प्रहलाद झुका बैठा था, उसका मज़बूत ढाँचा शांत संकल्प की तस्वीर पेश कर रहा था। उसके मज़बूत और सख्त हाथों ने अपने घुटनों पर आराम किया हुआ था, लेकिन उसकी तेज़ और चौकस आँखें शाहज़ाद से कभी नहीं हटीं। प्रहलाद शाहज़ाद के तूफ़ानी समुद्रों में अटूट लंगर था, अपने नेता की रणनीतिक दृष्टि के लिए व्यावहारिक व्यक्ति था। उनके बीच की ख़ामोशी खाली नहीं थी; यह दो दिमाग़ों के गणना में गहरे डूबे होने का शांत तनाव था, एक ऐसे खेल में अगली चाल का अनुमान लगा रहे थे जहाँ सब कुछ दाँव पर लगा था। प्रहलाद की कोहनी के पास एक आधा खाया हुआ सूखा राशन भुला हुआ पड़ा था, जो उनकी निगरानी की तात्कालिकता का प्रमाण था।

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