प्रल्हाद और शहजाद का भ्रम और गीलगमेश का निरीक्षण और समाधान
हा बोलो अली कैसे आना हुआ इस बदनसीब के पास ।
आपका पुराना दोस्त आपसे मिलना चाहता था।
और तुम तुम्हें क्या करना था ,
अब तो इतना ही बोल सकता हूं उनको आपका यह आलीशान पलेस दिखाने के लिए मैं उनसे साथ आया ।
और अपनी बीवी को साथ लाने का कारण।
कुछ पुराने यादें ताजा कर दी थी मिस्टर शापुर सॉरी शहजाद मियां ।
बहुत दिनों बाद मिले हो प्रह्लाद बोलो क्या खिदमत सकता हूं आपकी।
हमारी मांगे तो बहुत पुरानी है पर तुम पूरी नहीं कर सकती। यह तुम्हारा बना हुआ अलग संसार तुमने छोड़ने की हमारी मांग है।
कुछ चीजें बदली नहीं जा सकती।
क्या तुम्हारे सभी शागिर्द यहां मौजूद है?
हां जब अली बताया है यह सिर्फ बातचीत के लिए हैं तो हमसे भी कोई दगाबाजी नहीं होगी।
क्या मानते हो शहजाद यहां सभी व्यवस्था और सुविधाएं उपलब्ध है।
ये वह दुनिया है जिसे कोई नहीं अपनाता ।
तो क्या मजबूरी है तुम्हें यह अपनानेकी तुम्हारे सारे शागिर्द से भी वही सवाल मैं पूछना चाहूंगा।
यह सवाल सुनकर माहौल में तनाव बढ़ गया। प्रह्लाद ने अपनी बात जारी रखी: "तुम्हें लगता है कि तुमने सही रास्ता चुना है। लेकिन तुम्हारा रास्ता, तुम्हारा यह इस्लाम, सिर्फ़ एक किताब, एक विचारधारा पर टिका है। तुमने अपनी सारी विरासत, सारी पहचान को दफ़ना दिया।"
शहजाद की आँखें जल उठीं। "हमारी पहचान हमारी आस्था है! तुमने अपनी हिन्दू पहचान को कैसे भूला दिया? अपने ग्रंथों, अपने पूर्वजों को कैसे छोड़ दिया?"
प्रह्लाद शांत रहा। "हमने कुछ नहीं छोड़ा। हमने सब कुछ अपनाया, लेकिन अपनी आँखों से देखा। हिन्दू धर्म में भी कई विचारधाराएँ हैं। लेकिन तुम लोगों ने केवल एक ही सत्य को माना। क्या तुमने कभी ज़ंद अवेस्ता पढ़ा है?"
शहजाद चौंक गया। "ज़ंद अवेस्ता? तुम क्या कहना चाहते हो?"
प्रह्लाद ने जवाब दिया, "ज़ंद अवेस्ता पारसी धर्म का पवित्र ग्रंथ है। उसमें भी सही और गलत के बारे में बताया गया है, अच्छाई और बुराई की लड़ाई के बारे में कहा गया है। लेकिन उसमें कहीं भी एक ही रास्ता सही है, ऐसा नहीं कहा गया। उसने बताया कि हर इंसान के भीतर अच्छाई और बुराई दोनों हैं। तुमने एक रास्ता चुन लिया और अपने सारे रिश्तों को, अपनी पुरानी पहचान को, सब कुछ छोड़ दिया।"
शहजाद ने कहा, "यह कोई छोड़ने की बात नहीं है, यह तो अपनाना है। हम उस सच्चाई को अपनाते हैं जो हमें मुक्ति दिलाती है।"
प्रह्लाद ने कहा, "मुक्ति? क्या यही मुक्ति है कि तुम्हारे पास तुम्हारी पुरानी दुनिया के लिए कोई जगह नहीं? क्या यह मुक्ति है कि तुम्हारे अपने बेटे को तुमसे मिलने के लिए इस तरह छिपकर आना पड़ता है? यह तुम्हारे और मेरे बीच का विवाद नहीं है, शहजाद। यह तुम्हारी आत्मा और तुम्हारे बनाए हुए विश्वास के बीच का विवाद है।"
प्रह्लाद की बात ने शहजाद को भीतर तक हिला दिया। वह जानता था कि प्रह्लाद सिर्फ़ बहस नहीं कर रहा था, बल्कि उसे उसकी अपनी दुनिया की सीमाओं का एहसास करा रहा था। इस बातचीत ने न सिर्फ़ उनके पुराने प्रतिद्वंद्व को जगाया, बल्कि उनके बीच धार्मिक और वैचारिक मतभेदों की गहरी खाई को भी उजागर कर दिया था। अब शहजाद को यह फैसला करना था कि क्या वह अपने विश्वास को और अधिक मजबूत करेगा, या फिर प्रह्लाद की बातों पर विचार करेगा, जो उसे उसके ही बेटे की ख़ातिर यहाँ तक खींच लाई थीं।
प्रह्लाद की बात ने शहजाद को भीतर तक झकझोर दिया। प्रह्लाद ने अपनी बात जारी रखी, उसकी आवाज़ में इतिहास और दर्शन का गहरा ज्ञान झलक रहा था। "शहजाद, तुम्हारा इस्लाम एक नई विचारधारा है, जिसने इतिहास के पैमाने पर अभी बस जन्म ही लिया है। लेकिन ईरान, जिसे तुम आज देखते हो, वह हज़ारों सालों से मौजूद है। वह इस्लाम के आने से बहुत पहले से एक महान सभ्यता रहा है।"
प्रह्लाद ने आगे कहा, "ईरान की नींव उसके प्राचीन दर्शन और धर्म पर टिकी है, जिसका मुख्य ग्रंथ ज़ंद अवेस्ता है। ज़ंद अवेस्ता ने लोगों को अच्छाई (अहुरा मज़्दा) और बुराई (अंगरा मैन्यु) के बीच चुनाव करने का दर्शन दिया। उसने लोगों को व्यक्तिगत नैतिकता और कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना सिखाया। यही वह नींव है जिसने ईरान को हज़ारों साल तक एक शक्तिशाली और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र बनाए रखा।"
"इस्लाम तुम्हारा एक पॉलिटिकल एजेंडा है!"
प्रह्लाद ने अपनी बात पर ज़ोर दिया, "तुम्हारा इस्लाम, जिसे तुम एक सच्चाई मानते हो, वह एक राजनीतिक एजेंडा ज़्यादा लगता है। इसने लोगों को एकजुट करने के बजाय, उन्हें अपनी पुरानी पहचान और विरासत से काट दिया। इसने एक ही रास्ता, एक ही सत्य थोप दिया और जो इससे अलग हुए, उन्हें 'काफ़िर' कहकर अलग कर दिया।"
प्रह्लाद की बातों ने शहजाद को सोचने पर मजबूर कर दिया था, लेकिन उसने अपने आप को संभाला और एक कड़वा सवाल दाग दिया। "तुम्हारे एक मुलाक़ात से तुम्हें क्या लगता है, तुम ये सब बदल दोगे? इतनी आसानी से सब कुछ बदल जाएगा?"
प्रह्लाद शांत रहा। शहजाद ने अपनी बात जारी रखी, "तुम अपने परिवार को क्यों नहीं बचा पाए? जब तुम अपने ही परिवार को नहीं बचा पाए तो फिर तुम्हें मेरे परिवार के बारे में सोचने का क्या हक़ है?"
यह सवाल सीधे प्रह्लाद के दिल पर लगा। उसकी आँखें भर आईं, लेकिन उसने अपनी भावनाओं को नियंत्रित किया। "शहजाद, मैंने अपने परिवार को खो दिया, क्योंकि मैं तुम्हारे जैसा नहीं था। मैंने अपने विश्वास की खातिर अपने परिवार को नहीं छोड़ा। यही कारण है कि मुझे अपने परिवार के लिए लड़ना पड़ा। मेरा परिवार मेरे लिए एक विचारधारा नहीं, बल्कि मेरी जिंदगी थी।"
शहजाद ने तंज कसा, "तो क्या मैं अपने परिवार को बचा नहीं रहा हूँ? मैं अपने परिवार के लिए ही तो यह सब कर रहा हूँ, ताकि हम एक सुरक्षित दुनिया में रह सकें।"
प्रह्लाद ने जवाब दिया, "तुमने अपनी दुनिया बनाई, लेकिन तुमने अपने परिवार को उसके भीतर कैद कर दिया। तुमने उन्हें अपनी शर्तों पर जीने को मजबूर किया। तुम अपनी विचारधारा से प्यार करते हो, अपने परिवार से नहीं।"
यह सुनकर शहजाद की आँखें नम हो गईं, लेकिन वह अपनी बात पर अड़ा रहा। "मैं अपने परिवार को बचा रहा हूँ, और मैं तुम्हें अपने परिवार को बचाने से रोकूँगा, क्योंकि तुम्हारे विचार हमें कमजोर करते हैं। मैं जानता हूँ कि तुम और अली एक-दूसरे के साथ हैं, लेकिन मैं तुम दोनों को अलग करूँगा।"
प्रह्लाद ने कहा, "तुमने अपनी दुनिया को इस तरह बना दिया है कि तुम्हारे अपने लोग तुमसे दूर जा रहे हैं। तुमने अपने बेटे को अपनी विचारधारा से अलग कर दिया है। तुम अब भी सोच रहे हो कि तुम सही हो, लेकिन तुम गलत हो। मैं तुमसे लड़ने के लिए यहाँ नहीं आया हूँ, मैं तुम्हें यह बताने के लिए आया हूँ कि तुम गलत कर रहे हो।"
शहजाद ने जवाब दिया, "मुझे पता है कि मैं क्या कर रहा हूँ। मैं अपने लोगों को बचा रहा हूँ, और मैं तुमसे अपने परिवार को बचाने से रोकूँगा।"
"तुम्हें ये बातें ताजा करनी हैं, शापुर? शहजाद, मैंने अपना धर्म बचाया परिवार खोकर, और तुमने ठीक उल्टा किया।"
प्रल्हाद की आवाज में एक गहरा दर्द और कसक थी। ये सिर्फ शब्द नहीं थे, बल्कि बीते हुए कल के घाव थे जो फिर से हरे हो गए थे। उसके सामने खड़ा शापुर, जो कभी उसका सबसे अच्छा मित्र था, आज एक पराया लग रहा था।
शापुर ने ठंडी साँस ली। "धर्म की दुहाई मत दो, प्रल्हाद। ये वो धर्म नहीं था जिसने हमें आज यहाँ खड़ा किया है।" उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जो विश्वासघात की कहानी कह रही थी। "तुमने अपने परिवार को खोकर भी क्या पाया? सिर्फ एक टूटी हुई विरासत और यादें।"
प्रल्हाद ने अपना सिर उठाया, उसकी आँखों में ज्वाला थी। "मैंने अपना आत्मसम्मान बचाया, शापुर। वो चीज जो तुमने सत्ता और धन के लिए बेच दी। एक राजा बिना अपने लोगों के कुछ नहीं होता, और तुम ये भूल गए।"
दो दोस्तों के बीच ये सिर्फ एक बहस नहीं थी, बल्कि दो अलग-अलग रास्तों की कहानी थी। एक वो जो अपने मूल्यों पर अटल रहा, और दूसरा जिसने सब कुछ पाने के लिए अपनी आत्मा बेच दी। उनकी कहानी आज भी इतिहास के पन्नों में लिखी हुई है, एक ऐसी कहानी जो दिखाती है कि धर्म और कर्तव्य का पालन करने में क्या कीमत चुकानी पड़ती है।
अली का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था। उसने दोनों के बीच में आकर अपनी आवाज थोड़ी ऊंची की। "बस करो तुम दोनों! मुझे यह सब समझ नहीं आ रहा है।"
वह प्रल्हाद और शापुर की तरफ बारी-बारी से देखता है। "हम यहाँ सिर्फ एक मुलाक़ात के लिए आए थे। यह बहस किस बात पर हो रही है? तुम दोनों क्या बोल रहे हो, जरा ठीक से समझाओ।"
उसकी आँखों में निराशा थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि जो दो दोस्त सालों बाद मिल रहे हैं, वे इस तरह से क्यों लड़ रहे हैं।
प्रल्हाद बोला
तुम खुशनसीब हो के औलाद ज़िंदा है तुम्हारी, शहज़ाद।"
इस बात से माहौल और गहरा हो गया, और शापुर के चेहरे पर एक पल के लिए उदासी छा गई।
शापुर की आँखें नम हो गईं, और उसने प्रल्हाद की ओर देखा, जैसे माफ़ी माँग रहा हो। "प्रल्हाद," उसने धीरे से कहा, "तुम सही कहते हो। मैंने अपना धर्म और अपना ज़मीर सब कुछ खो दिया था, लेकिन कम से कम मेरे पास मेरी औलाद है।"
प्रल्हाद ने सिर झुकाया, और एक लंबी साँस ली। "मुझे ख़ुशी है, शापुर, कि तुम यह समझ रहे हो। कम से कम तुम्हारी औलाद को तुम्हारे जैसा नहीं बनना पड़ेगा।"
सर सलामत तो पगड़ी पचास प्रल्हाद।
मैने जो चुना है उसके लिए मैने क्या खोया है ये हमारी आपसी बात है प्रल्हाद।
बात तो ठीक है पर कब तक ये बोझ उठाओगे ?
तुम बताओ तुमने फिरसे शादी क्यों नहीं ।
आपस की बाते सब के लिए में तो खोल सकता हूं पर तुम्हे भी तुम्हारी काली करतूतों का पता बताना होगा शहजाद ।
मेरे शागिर्द मेरे है वो इन मुलाकातों को ज्यादा सीरियस नहीं लेते है प्रल्हाद , में ऐसी 56 लोगों से कन्फेशन कर चुका हु।
में 57 वा हु ऐसा समझो और में तुम्हे अपनी औलाद के सामने गलत साबित करना नहीं चाहता शहजाद ।
वो तो जब से अपने दादा और अम्मी के साथ गया है उसका मेरा कुछ खास मतलब नहीं है एक दूसरे से प्रल्हाद ।
कब्र पर मिट्टी उसे ही डालनी होगी न , जरूरी नहीं है यहां लोग मिशन पे मरते है ।
जिंदा फट जाते है और पानी में जहाजों में मरते है सब को इतना अच्छा अंत थोड़ी मिलता है प्रल्हाद।
तुम अपनी बातों के लिए आज भी पसंद किए जाते हों ये समझ आया , हमारी आवाज तो हमारे परिवार के साथ चली गई अब हम सिर्फ हमारे ऑपरेशन पे ध्यान देते है शहजाद ।
क्या सोचते हो कोई उम्मीद कर सकते है इस जहां से निकलने की ।
नहीं बिल्कुल नहीं। कोई जरूरत लगती हैं तुम्हे ।
बोलो वो क्या था कि तुम्हे अपनी पत्नी और माँ में चुनना पड़ा और तुम्हारा चुनाव सही भी होगा पर नतीजा तुम सड़ रहे हों जिंदा शहजाद ।
और तुम ये चुनाव न कर सके कि बीवी या खुद में इसलिए तुम तो हर दिन जल रहे हो प्रह्लाद।
तुम्हे क्या लगता है में मरने के बाद मेरी पत्नी को जिंदा छोड़ते वो मजहबी दरिंदे , अरे लाखों की भीड़ को मारने वाले थोड़ी कोई जमीर रखते है।
हम आज भी उन्हीं दरिंदो के बीच है प्रल्हाद ।
तुम्हारी मर्जी परिवार या मजहब तुम्हे आज चुनाव करना है हमने तो उसी साल कर लिया था।
कौनसा परिवार ये हमारे शागिर्द हमारे परिवार है।
सिर्फ एक मौका देंगे तुम्हे यहां से निकलने का ।
पाशा !
जो जनाब अगले आधे घंटे के लिए इन काफिरों को यहां से जाने का मौका दे देना।
वह अब्बा वाह आपका मजहब तो बड़ा ही शांतिप्रिय दिखता है।
ये अली है पाशा , इसको नाम अली का मिला है बड़ा बिजनेसमैन है ये औलाद है मेरी । भले ये हमारे मजहब का है पर इसे ये गंदगी समझता है जो हम करते है उसे ।
काफिरों को साथ देने वाले को हम मुनाफिक ही समझे या नहीं जनाब ।
हां मजहब सबसे ऊपर हैं पाशा बाकी चीजें लाजमी है ।
अगर इजाजत हो तो ये काफिर बीच में बोल सकता है शहज़ादजी।
ये किसे लाए हो प्रल्हाद।
ये मेरे कर्ण अर्जुन समझलो शहजाद बड़े दूर से आए है एक ग़िलगमेश है पंडित है , और दूसरा प्रताप है अंग्रेज है ।
दोनों आज के लिए तो भारत से आए है ।
और मिले कहा ये तुम्हे ?
वहीं हमारे मूर्ति के कारखाने में आए हमसे मिलने वो पुराना वाला कारखाना जहां हमारा हादसा हुआ वो या कही और ।
नया कारखाना है बलोच में ।
तुम दोनों शक्ल से तो लगते हो हिन्दू पर तुम अंग्रेज कैसे हो गए प्रताप?
मेरे दादा ब्रिटिशों के साथ लंदन गए थे और मेरे माता पिता ने मुझे भारत पढ़ने भेजा ।
तुम्हे मिलकर अच्छा लगा ।
और ये वर्का के राजा नाम कैसे मिला तुम्हे पंडित।
मेरे पापा इतिहास के शिक्षक थे उन्होंने ढूंढकर लगाया नाम।
देखो पाशा हमें सिखाने आए हुए काफिरों में एक ईसा के धर्म का पालन करता है दूसरा बुदपरस्त है।
बोलो ग़िलगमेश क्या कहना चाहते हो।
आपने ये जो रास्ता चुना है इसका आपको कोई गम पछतावा नहीं है न ।
ये सवाल पहली बार सुना है हमने यहां। ऐसे सवाल कभी हमें गिरते नहीं और नहीं गिरेंगे क्यों पाशा ?
जो जनाब आप ही हमारे लिए वालिद हो आप जो कहोगे वो सच हो होगा ।
क्या आपको लगता है एक भी शागिर्द आपके इस बात का विरोध नहीं करता जनाब।
पाशा पूछो सभी को?
अभी तो वो उस पर नतीजा निकाल ही नहीं पाएंगे शहजादजी क्योंकि आपके सामने है वो।
क्या उन्हें नहीं लगता इस दुनिया के जन्नत का जिक्र वो करे नाकी मरने के बाद की जन्नत का।
इस दुनिया में कौनसी जन्नत है , जनाब।
सही सवाल ।
ये जो अली है वो जैसे आपके वालिद ने बताया उनका बेटा है और वो एक बिजनेस मन है और हम भी उनके बिजनेस में काम करने आए है भारत से , और हम चाहते है के आपके सभी भी वो कम कर सकते है जो हम कर सकते है।
तुम हम दोनों से आगे हो बातों में ग़िलगमेश तुम्हारी परवरिश और उच्च शिक्षा खास ही रही होगी ।
एक पल लिए मेरा पाशा भी तुम्हारी बातों में आगया ।
क्या पाशा ये जो अभी हम कर रहे है देश विदेश में हमारा फैला हुआ ताम झाम है उसके साथ तुम खुश नहीं हो ।
मेरा बेटा है मुझे पता है इसका बिजनेस हमारे इस मिशन के खर्चे के बराबर पूरा कमाता है ।
तुम्हे सब जन्नत से ही आ रहा है यहां तक ये पूरी सेना जो हमने अलग अलग देशों से उठाई है इसमें अली के शहर और इनके भारत से भी फौज आई है इससे अच्छा वो हो ही नहीं सकता ।
आप सही कह रहे है जनाब । में भटक गया था ।
पाशा क्या तुम्हे अपना परिवार है ?
यही मेरा परिवार है। बाकी तो धोखा ही है।
जो धोखा तुम्हारे वालिद के बेटे अली ने खाया है वो तुम्हारे सामने है। और वो धोखा बड़ा ही अजीज है ऐसा है ,किसी को अपने जिंदगी बना लेना और उसकी प्रति समर्पित हो जाना ये जन्नत है ।
ये दोनों बुढ़ापे वाले आदमी तो निकल जायेंगे पर हमारे पास समय पड़ा है।
अली, प्रल्हाद, शहजाद तीनों ने एक साथ अलग अलग नजरिए से देखते हुए चिल्लाया गिलगमेश।
प्रल्हाद बरसो पुराना हादसा ताजा हुआ ऐसा लगता है, संभालो अपने बंजारे को इसका कोई परिवार नहीं है पर ये चाहता है कि दरिंदे घर बसाए।
गिलगामेश इनकी पूरी जिंदगी इन्होंने सिर्फ यही बंकर और यही लोग देखे है इन्हें बाहर खुद को तो अड़चनें आएगी पर इनपे भरोसा किया नहीं जा सकता कि वो तुम्हारी अकल्पनीय उम्मीद पर खरे उतरे, अली बोला और to be honest तुम मेरी बीवी के खिलाफ इनको उकसा रहे हो।
ये मजहब के दरिंदे है गिलगामेश इन्हें बाहर की दुनिया से दूर रखना सबसे बढ़िया तरीका होगा मजहब को फैल ने से रोकने का इन्हें यही सड़ने दो शहजाद की तरह प्रल्हाद बोला।
देखा पाशा ये जिस हादसे की बात कर रहे थे वो तुमसे कितना मिलता है।
अब तुम्हे समझ तो आया होगा तुम्हारा ये जो मजहब का धंधा है उसे बाहर के दुनिया में कितनी कीमत है , पैसे की बात अलग है पर आत्मसम्मान अगर तुम्हे पता हो तो दरिंदे ये तुम्हारी पहचान है तुम्हारे वालिद हो या बाहरी काफिर हो ।
में गीलगामेश जो वर्का का राजा बनना चाहता है तुम्हे आवाहन करता हूं में आज यहां से निकल जाऊंगा पर तुम्हे सोच के बताना है कि हमारी ट्रैवल कंपनी को कौन कौन ज्वाइन करेगा ।
बाकी रूल वहां बताए जाएंगे । ये जिंदगी पूरी तरह से खत्म करने के बाद ही नया आरंभ होगा ।
तुम्हे ये बात तुम्हारे वालिद को ही बतानी है और वो अली को बताएंगे,मुझे बिल्कुल नहीं लगता कि उन्हें इस विषय में कोई भी आपत्ति होगी।
चले प्रल्हाद जी । आप का तो पता नहीं मेरा और प्रताप का कम काम में कर चुका ।
ये हिंदुस्तानी ही सोच और कर सकता है गिलग्मेश हम तो जले है छास भी फुक कर पीते है।
तुम्हे बड़े दाव लगाने में मजा आता होगा पर नतीजा दोनों दिशा ले सकता है ये ध्यान रखना।
हम छोटी चीजों का शोक रखते ही नहीं प्रल्हाद जी।
पाशा इस हिंदुस्तानी काफिर के बातों में मत फंसो, यहूदी के तरह हुनुदी भी तुम्हारी ईमान के दुश्मन है।
होगे हमारे ईमान के दुश्मन पर , हमें ये दिखाने के लिए के बाकी दुनिया हमारे बारे में क्या सोचती हैं और हमें आत्मसम्मान के बारे में भी सोचना होगा। इसलिए शुक्रिया पंडित ।
हम चाहेंगे कि हम अली के साथ उनके धंधे में शामिल होंगे जिसमें आप हमें क्या किरदार देते है वो हम जानकर स्वीकार करेंगे।
अपने परिवार बनाए और इस जन्नत का मजा ले।
इस दुनिया में हीं जन्नत है ये कबूल है तो ठीक समझे हम फिर मिलेंगे । चलते हैं प्रल्हाद जी।
ये हमारे पुराने जमाने से अलग हैं, यही सोच कर में तुम्हे और तुम्हारी बातों को सही होने का आशीर्वाद दे तो दु। पर नतीजा दोधारी है ध्यान रहे ।
प्रल्हाद जी वैष्णव युद्ध का विरोध ही करता है और वैष्णव गुरु से असुरों को वरदान मिला है , इसमें कौनसी बुरी बात है।
तुम सच में अकल्पनीय हो गिलगामेश खुश रहो, जीते रहो।
मैने सोचा भी नहीं था कि मेरी टीम एक दिन में तैयार हो जाएगी प्रल्हाद जी आपके दो साथी मेरे भी साथी बने है और उनका नजरिया मुझे बिल्कुल पसंद आया ।
बेशक हमारा बिजनेस जरूर आगे बढ़ेगा ।
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