कबीर आणि रामानंद>>मूर्ती पूजा आणि अद्वैत
चंहूं वेदीं जाण साहिशास्त्री कारण
अठराहीं पुराणें हरिसी गाती ॥१॥
मंथुनि नवनीता तैसें घे अनंता ।
वायां व्यर्थ कथा सांडी मार्गु ॥२॥
एक हरि आत्मा जीवशिवसमा ।
वायां तूं दुर्गमा न घाली मन ॥३॥
ज्ञानदेवा पाठ हरि हा वैकुंठ ।
भरला घनदाट हरि दिसे ॥४॥
कबीर पाठ आहे तुझा अभंग.
आताही तुला अभंग आठवतो म्हणजे तू मुळात सात्विक स्मृतीचा धनी आहेस.
आचार्य सगळेच हरी आहेत असा याचा अर्थ घ्यावा का ?
हा तुझ्या सारख्या ब्रम्हचाऱ्याला हा अर्थ सार्थ आहे .
पण जो मुळात कर्म करतो म्हणजे गृहस्थाश्रमात आहे त्याला असे सांगावे लागते की सगळ्यांमध्ये हरी आहे .
असे का आचार्य ?
नमः शिवाय रामानंद जी .
राम कृष्ण हरी चंद्रशेखर जी.
आज समुद्र का राजा आहे वृंदानगरी मे कैसे .
जरा मिल के परिस्थिती का अंदाजा लेना चाहता था की अगला वैष्णव गुरू कैसा होगा.
समय पर उपस्थित हो आप की सामने जो बालक बैठा है.
उसका नाम कबीर है.
क्यो कबिरा क्या खास हैं तुम्हारे विष्णू मे जो मेरे महादेव मे नही है.
शिव वैरागी है दादू , विष्णू गृहस्थ .
जब धर्म मे परिवर्तन की जरुरत होती है तो करूनायुक्त कल्याण के देवता शिव की जरुरत है और जब धर्म पालन करणे वाले लोगो को न्याय की आवश्यकता होती हे तब विष्णू अवतार लेते है!
झुलेलाल भी तो वरुण के अवतार थे. आपकी पगडी अच्छी और इतिहास की पहचान लग रही है .
अद्भुत हर हर महादेव . कबीर ,तुम्हारी वाणी की सहजता ने मन की भ्रम से निकाल दिया .
क्या सोचते हो चंद्रशेखर जो आगे गया वो कृष्ण रूप विष्णू था या जो सामने बचा है वो व्यास रूप विष्णू है .
इसका तो काम ही है ,माहिती का संकलन करना.
मे देख रहा हुं रामानंद जी जो गया था उसे मनाना पडा था. यहा तो संदेह को कोई स्थान नहीं दिखा .
अठरा भिन्न प्रकार के पुराणे क्यो निर्माण किये है आचार्य.
एक महादेव चमार बना दुजा बना लोहार सुतार अन्य बना सोनार तेली कलावंत तलाठ.
11 रुद्र शिव अंश है और 12 आदित्य मे इंद्र और विश्व वामन विष्णू.
8 वसु मे वैष्णव ध्रुव और 2 अश्विनी कुमार.
यही 33 लोगो का हे या गाव .
पंचायतन का संतुलन और अन्य धारणा से मुक्त समाज की रचना के लिये पुराण 18 है.
गुनो के आधार पर इसके 3 भाग है राजसिक राजा की लिये, तामसिक इतर सबको तथा सात्विक पुराण गृहस्थ राजर्षी तथा असण्यासी ब्रम्हचारी को.
आपकी माहिती के लिये धन्यवाद .
कबीर व्यास को भी विष्णू का रुप मानते हो .
व्यास हो या कोई और सब मे विष्णू समाया है.
ये अद्वैत है और व्यास जो पराशर और सत्यवती की संतान है और गणेश जी को जिन्होने महाभारत सुनाया वो व्यास रूप या एक सगुण ब्रम्ह स्वरूप ही था जिस पंचायतन यानी 5 सगुण ब्रम्ह स्वरूप को आधार बनाया और पुराणो को मंदिर या मूर्ती सी जोडा .
रामायण का भास का प्रतिमा नाटक बताता है की देवकुळीक कुल के आद्य संस्थापक सी कूल के आखिरी मृत्यप्राप्त पूर्वज के प्रतिमा या मूर्ती रखते थे.
उसी प्रकार 5 सगुण ब्रम्ह ---
सूर्य(ब्रह्म), शक्ती , शिव, विष्णू, गणपती इनकी अन्य मूर्त रूप मी पूजा की गयी.
आदि समय मी व्रत स्वरूप जैसे नवरात्र और गणेशोत्सव है वैसें आवाहन पूजन विसर्जन के लिये मुहूर्त की आवश्यकता होती थी.
पर जब नये मूलद्रव्य की खोज हुई मंदिर मी विग्रह की स्थापना की जाने लगी .
अब इन्ही मंदिर को और धर्मपालन करणे वाले को बचाने वाले जो लोग होंगे ,उन्हे याद रखना तुम्हारी यानी होने वाले वैष्णव गुरू की है.
जीवन की कुछ आर्य सत्य है उसमे अंतिम सत्य से न तुम्हारे मां, पापा, दादा बचे ना तुम्हारे नाना बचेंगें ना हम भी तुम्हारी कथा पढ , सुन या देखं पायेंगे.
पर तुम्हारी कथाओ हमारी कही गई कथाये भी सामील हो.
शुभाशिष कबीर धन्यवाद दादू.
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