## नौरोज़ और रमज़ान की सुबह — बिखरे हुए यात्री, एक साझा धागा




*(21 मार्च 2026 — वसंत विषुव, नौरोज़ और रमज़ान का पवित्र महीना)*


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उस रात के बाद से काफ़ी वक़्त बीत चुका था। शहजाद के बंकर से निकले तीनों — प्रल्हाद, गिलगामेश और प्रताप — अब अलग-अलग दिशाओं में फैल चुके थे। पर आज का दिन कुछ और ही था।


आज **नौरोज़** था — और साथ में **रमज़ान** का पवित्र महीना भी चल रहा था।


एक तरफ नई शुरुआत का जश्न, दूसरी तरफ संयम और आत्मचिंतन का वक़्त।


दोनों एक साथ। जैसे ज़िंदगी अक्सर करती है — खुशी और तपस्या एक ही दिन।


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**इस्तांबुल, तुर्किये — प्रल्हाद**


गालाता पुल के पास एक छोटे दफ़्तर में प्रल्हाद बैठा था। सामने मेज़ पर कागज़ों का अंबार था — वीज़ा फाइलें, NOC पत्र, गल्फ देशों के लेबर परमिट। उसकी **रिक्रूटमेंट एजेंसी** — जिसका नाम उसने रखा था *"नदी"* — अब धीरे-धीरे अपने पैर जमा रही थी।


बाहर इस्तांबुल की गलियों में रमज़ान का माहौल था। इफ्तार से पहले की वो अजीब शांति — जब पूरा शहर एक साँस रोककर बैठा हो। दुकानें खुली थीं पर धीमी थीं। लोग थके हुए पर मुतमईन थे।


प्रल्हाद हिंदू था। उसने रोज़ा नहीं रखा था। पर उसने अपने दफ़्तर के तीनों मुस्लिम स्टाफ के लिए इफ्तार का इंतज़ाम किया था — खजूर, शोरबा, और रोटी।


उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया:


*"अब्बू, नौरोज़ मुबारक। रमज़ान करीम। दादा ने भी याद किया।"*


यह अली का मैसेज था।


प्रल्हाद ने फोन को देर तक देखा। उसे याद आया — कभी शहजाद ने कहा था कि *"काफिर हमारे त्योहार नहीं मना सकते।"* और आज उसी शहजाद का बेटा एक काफिर को नौरोज़ और रमज़ान दोनों की मुबारकबाद दे रहा था।


उसने धीरे से टाइप किया — *"जीते रहो। इफ्तार पर आ जाओ कभी।"*


उसके सामने की खिड़की से बोस्फोरस का पानी दिख रहा था। सूरज ढलने में अभी वक़्त था — पर रोशनी नरम हो चली थी।


*"रमज़ान सिखाता है कि भूख क्या होती है,"* प्रल्हाद ने खुद से कहा, *"मैंने तो बिना रोज़े के भी यह सीखा था।"*


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**दुबई, UAE — अली**


जुमेइरा के एक शॉपिंग मॉल की ऊपरी मंजिल पर अली अपनी **ट्रैवल कंपनी** *"वर्का टूर्स"* का नया ऑफिस सेट कर रहा था।


दुबई में रमज़ान का मतलब था — दिन में सन्नाटा, रात में रौनक। इफ्तार के बाद पूरा शहर जाग उठता था। अली के ऑफिस में भी यही हाल था — दिन में धीमे काम, रात में मीटिंगें।


आज नौरोज़ पर उसके ऑफिस में छोटी सी इफ्तार दावत थी। हफ्त सब्ज़ी की थाल के साथ खजूर और ज़मज़म पानी भी रखा था। ईरानी, तुर्क, भारतीय — सब एक दस्तरख्वान पर बैठे थे।


अज़ान की आवाज़ आई।


सबने एक साथ खजूर उठाया।


अली ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं। उसे याद आया — बचपन में अब्बा के साथ पहला रोज़ा। वो दिन जब शहजाद इंसान था, मिशन से पहले।


*"या अल्लाह,"* उसने धीरे से कहा, *"अब्बा को भी रास्ता दिखा।"*


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**मदीना, सऊदी अरब — गिलगामेश**


मदीना में रमज़ान का मतलब कुछ और ही था।


गिलगामेश — जो हिंदू था, पंडित का बेटा — पहली बार मदीना में था। और पहली बार रमज़ान के महीने में।


वह मस्जिद नबवी के पास की गली में बैठा था। शाम की रोशनी में मीनारें सोने जैसी लग रही थीं। हज़ारों लोग इफ्तार की तैयारी में थे — कुछ सड़क पर ही बैठ गए थे, दस्तरख्वान बिछाकर।


एक बुज़ुर्ग ने गिलगामेश को भी इशारे से बुलाया — *"आओ, बैठो।"*


गिलगामेश झिझका। *"मैं... मैं रोज़ेदार नहीं हूँ।"*


बुज़ुर्ग ने हँसकर कहा — *"इफ्तार सिर्फ रोज़ेदारों के लिए नहीं है। दस्तरख्वान सबके लिए होता है।"*


गिलगामेश बैठ गया।


खजूर खाया। पानी पिया।


उसने अपने पापा को मैसेज किया — *"आज मदीना में एक अजनबी के साथ इफ्तार किया। रमज़ान अजीब चीज़ है — भूख रखते हैं और फिर सबको खाना खिलाते हैं।"*


पापा ने जवाब दिया — *"यही तो अतिथि देवो भव है, बेटा। बस अलग भाषा में।"*


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**लाहौर, पाकिस्तान — प्रताप**


प्रताप — अंग्रेज़ पहचान वाला भारतीय — आज लाहौर के **गुलबर्ग बिज़नेस डिस्ट्रिक्ट** में एक कॉफी शॉप में बैठा था। रमज़ान में दिन के वक़्त कॉफी शॉप आधी बंद थी — पर प्रताप के लिए एक कोने में जगह थी।


सामने उसके तीन कैंडिडेट थे — दो लड़के, एक लड़की — जो खाड़ी देशों में काम की तलाश में थे। तीनों रोज़ेदार थे।


प्रताप ने CV देखे, फिर घड़ी देखी। इफ्तार में डेढ़ घंटा बाकी था।


उसने मीटिंग रोकी और कहा — *"इफ्तार के बाद बात करते हैं। तुम लोग थके हुए हो।"*


एक लड़के ने हैरान होकर पूछा — *"आप रोज़ा नहीं रखते, फिर भी?"*


प्रताप ने कहा — *"रोज़ा तुम्हारा है। पर तुम्हारी थकान मुझे दिखती है। यही काफी है।"*


तीनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए।


इफ्तार पर प्रताप ने खुद खजूर और शरबत मंगवाया। और तब शुरू हुई असली बात — नौकरी की नहीं, ज़िंदगी की।


*"रमज़ान में जो फैसले होते हैं,"* प्रताप ने कहा, *"वो पक्के होते हैं। तो बताओ — सच में क्या चाहते हो?"*


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**कराची, पाकिस्तान — पाशा**


पाशा — जो कभी शहजाद का सबसे वफादार शागिर्द था — आज कराची के **पोर्ट कस्टम ज़ोन** में खड़ा था। उसके हाथ में क्लिपबोर्ड था।


रमज़ान में बंदरगाह का काम धीमा नहीं होता — बल्कि बढ़ जाता है। खजूर, ज़ैतून, इत्र, कपड़े — सब खाड़ी से आते हैं इस महीने। पाशा की **कार्गो कंसल्टेंसी** *"बंदरगाह लॉजिस्टिक्स"* के लिए यह पहला असली इम्तिहान था।


आज उसकी पहली बड़ी खेप थी — ईरान से आने वाले खजूर और केसर, जो दुबई होते हुए यूरोप जाने थे। रमज़ान की खजूर की डिमांड — सबसे बड़ी खेप, सबसे तेज़ डेडलाइन।


पाशा सुबह से काम पर था। रोज़ा रखा हुआ था — पर हाथ नहीं रुके।


बंदरगाह पर वही बूढ़ा मल्लाह था। उसने पाशा को देखकर कहा:


*"बेटा, रमज़ान में जो मेहनत होती है, उसका सवाब दोगुना होता है।"*


पाशा ने पूछा — *"और नौरोज़ पर?"*


मल्लाह हँसा — *"नौरोज़ तो बोनस है। अल्लाह भी खुश होगा कि उसकी बनाई दुनिया में बहार आई।"*


पाशा ने पहली बार महीनों में खुलकर हँसा।


डॉक्युमेंट पर साइन किए। पहली खेप रवाना हुई।


बंदरगाह पर खजूर के बक्से लदे जहाज़ को जाते देखता रहा — और सोचता रहा कि शहजाद ने जो सिखाया था, उसमें यह कहाँ था। यह मेहनत, यह हलाल रोज़ी, यह हँसी।


*कहीं नहीं थी। इसीलिए वो निकल आया था।*


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**तेहरान, ईरान — शहजाद**


शहजाद आज अकेला था।


उसके बंकर में सन्नाटा था। रमज़ान था — उसने रोज़ा रखा था, हर साल रखता था। पर इस बार इफ्तार पर कोई नहीं था। पाशा जा चुका था। बाकी शागिर्द भी कम होते जा रहे थे।


उसने खुद खजूर निकाला। अज़ान की आवाज़ बाहर से आई — तेहरान की मस्जिद से।


उसने रोज़ा खोला। अकेले।


बाहर से हफ्त सीन की खुशबू भी आ रही थी — नौरोज़ की थाल किसी ने सजाई थी पड़ोस में। सेब, सिक्के, सब्ज़े, और गुलाब।


रमज़ान और नौरोज़ — दोनों एक दिन।


शहजाद को याद आया — ईरान में सदियों से यह होता आया है। पहले नौरोज़ मनाओ, फिर रमज़ान निभाओ। दोनों इस ज़मीन की पहचान हैं। पर उसने तो एक को काफिरों का त्योहार कहकर छोड़ दिया था।


*"तो क्या मैंने अपनी ज़मीन से भी नाता तोड़ लिया था?"* उसने खुद से पूछा।


एक छोटी लड़की बाहर दौड़ रही थी — हाथ में लाल सेब।


शहजाद खड़ा हुआ। खिड़की खोली।


बाहर की हवा भीतर आई — ताज़ी, बहारी।


उसने अली को फोन किया।


घंटी बजती रही। फिर उठी।


*"अब्बा?"*


शहजाद की आवाज़ काँपी — *"रमज़ान करीम, बेटा। और... नौरोज़ मुबारक।"*


दूसरी तरफ लंबी चुप्पी।


फिर अली ने कहा — *"अब्बा, आपने दोनों कहे आज।"*


शहजाद ने कहा — *"हाँ। दोनों इस ज़मीन के हैं। दोनों मेरे हैं। मैं भूल गया था।"*


अली की आँखें भर आईं — दुबई में, इफ्तार की थाल के सामने।


*"इफ्तार पर आ जाइए, अब्बा। एक बार।"*


शहजाद ने जवाब नहीं दिया।


पर उसने खिड़की बंद नहीं की।


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वसंत आया था।


रमज़ान चल रहा था।


दोनों एक साथ — जैसे पुरानी ज़मीन और नई उम्मीद कभी-कभी एक ही दिन आ जाती है।


प्रल्हाद ने इस्तांबुल में अपने मुस्लिम स्टाफ के लिए इफ्तार सजाया। प्रताप ने लाहौर में रोज़ेदारों की थकान को समझा। पाशा ने कराची में हलाल मेहनत की पहली खेप रवाना की। गिलगामेश ने मदीना में एक अजनबी के दस्तरख्वान पर बैठकर इंसानियत चखी। अली ने दुबई में नौरोज़ और रमज़ान एक साथ मनाए।


और शहजाद ने — पहली बार — खिड़की खोली।


*कुछ टूटे हुए लोग, नई शुरुआत की तरफ — बस एक कदम।*


रमज़ान की रात लंबी होती है।


पर सहर से पहले — एक रोशनी ज़रूर आती है।


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**— जारी रहेगा**

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