## नौरोज़ की सुबह — बिखरे हुए यात्री, एक साझा धागा



*(21 मार्च 2026 — वसंत विषुव, नौरोज़)*


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उस रात के बाद से काफ़ी वक़्त बीत चुका था। शहजाद के बंकर से निकले तीनों — प्रल्हाद, गिलगामेश और प्रताप — अब अलग-अलग दिशाओं में फैल चुके थे। पर आज का दिन कुछ और ही था।


आज **नौरोज़** था।


नई शुरुआत का दिन। जब पुरानी ज़मीन नई कोंपलें उगाती है।


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**इस्तांबुल, तुर्किये — प्रल्हाद**


गालाता पुल के पास एक छोटे दफ़्तर में प्रल्हाद बैठा था। सामने मेज़ पर कागज़ों का अंबार था — वीज़ा फाइलें, NOC पत्र, गल्फ देशों के लेबर परमिट। उसकी **रिक्रूटमेंट एजेंसी** — जिसका नाम उसने रखा था *"नदी"* — अब धीरे-धीरे अपने पैर जमा रही थी।


उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया:


*"अब्बू, नौरोज़ मुबारक। दादा ने भी याद किया।"*


यह अली का मैसेज था।


प्रल्हाद ने फोन को देर तक देखा। फिर धीरे से टाइप किया — *"जीते रहो।"*


उसके सामने की खिड़की से बोस्फोरस का पानी दिख रहा था। दो महाद्वीपों के बीच का वो पानी, जो न पूरब का है न पश्चिम का — बस बहता रहता है।


*"जैसे मैं भी,"* प्रल्हाद ने खुद से कहा।


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**दुबई, UAE — अली**


जुमेइरा के एक शॉपिंग मॉल की ऊपरी मंजिल पर अली अपनी **ट्रैवल कंपनी** का नया ऑफिस सेट कर रहा था। नाम था — *"वर्का टूर्स"* — जो गिलगामेश ने सुझाया था।


आज नौरोज़ पर उसके ऑफिस में छोटी सी दावत थी। ईरानी, तुर्क, भारतीय — सब मिलकर हफ्त सब्ज़ी की थाल सजा रहे थे। सात चीज़ें, सात उम्मीदें।


अली के पास उसकी बीवी का मैसेज आया:


*"घर कब आओगे? बच्चे पूछ रहे हैं।"*


अली ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया — *"रात तक। आज नया सफर शुरू होता है।"*


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**मदीना, सऊदी अरब — गिलगामेश**


गिलगामेश — जिसे सब "पंडित" कहते थे — आज मदीना की एक पुरानी गली में किसी से मिलने आया था। वह यहाँ किसी टूर पैकेज के लिए नहीं था।


वह यहाँ **इतिहास के लिए** आया था।


उसके पापा — जो इतिहास के शिक्षक थे — उन्होंने एक बार कहा था: *"वर्का वो जगह है जहाँ लिखाई शुरू हुई। और मदीना वो जहाँ एक और लिखाई शुरू हुई।"*


गिलगामेश एक स्थानीय लाइब्रेरी में बैठा था। सामने पुरानी अरबी पांडुलिपियाँ थीं। उसका काम था इन्हें डिजिटल करना, एक सांस्कृतिक संरक्षण परियोजना के तहत।


उसके फोन पर अली का मैसेज आया:


*"नौरोज़ मुबारक, पंडित।"*


गिलगामेश ने हँसकर जवाब दिया — *"नौरोज़ पारसी त्योहार है, हम भारतीय मना रहे हैं, तुम अरब मुबारक दे रहे हो। यही तो वर्का है।"*


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**लाहौर, पाकिस्तान — प्रताप**


प्रताप — अंग्रेज़ पहचान वाला भारतीय — आज लाहौर के **गुलबर्ग बिज़नेस डिस्ट्रिक्ट** में एक कॉफी शॉप में बैठा था। सामने उसके तीन कैंडिडेट थे — दो लड़के, एक लड़की — जो खाड़ी देशों में काम की तलाश में थे।


प्रताप की **रिक्रूटमेंट फर्म** — *"सेतु मैनपावर"* — का यह पहला पाकिस्तान दौरा था। प्रल्हाद ने उसे यह जिम्मेदारी दी थी — *"तुम दोनों तरफ से बोल सकते हो, इसीलिए तुम सबसे काम के हो।"*


प्रताप ने तीनों के CV देखे। फिर सीधे पूछा:


*"तुम काम करना चाहते हो या सिर्फ देश छोड़ना चाहते हो?"*


थोड़ी चुप्पी।


फिर एक लड़के ने ईमानदारी से कहा — *"दोनों।"*


प्रताप मुस्कुराया। *"यही सही जवाब है। चलो, बात करते हैं।"*


नौरोज़ के दिन तीन नई ज़िंदगियाँ नई दिशा की तरफ मुड़ीं।


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**कराची, पाकिस्तान — पाशा**


पाशा — जो कभी शहजाद का सबसे वफादार शागिर्द था — आज कराची के **पोर्ट कस्टम ज़ोन** में खड़ा था। उसके हाथ में क्लिपबोर्ड था, आँखों में नई चमक।


उसकी **कार्गो कंसल्टेंसी** — *"बंदरगाह लॉजिस्टिक्स"* — अभी शुरू हुई थी। अली ने उसे यह मौका दिया था। प्रल्हाद ने उसकी फाइल देखी थी — और उस दिन फाइल बंद नहीं की थी।


आज उसकी पहली बड़ी खेप थी — ईरान से आने वाले खजूर और केसर, जो दुबई होते हुए यूरोप जाने थे।


बंदरगाह पर एक बूढ़ा मल्लाह था। उसने पाशा को देखा और कहा:


*"बेटा, नौरोज़ पर जो जहाज़ रवाना होता है, वो हमेशा सही बंदरगाह पर पहुँचता है।"*


पाशा ने पूछा: *"यह किसने कहा?"*


मल्लाह ने कंधे उचकाए — *"मेरे बाप ने।"*


पाशा ने एक पल रुककर सोचा। उसके अपने अब्बा — शहजाद — ने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही थी। बस मिशन था, मजहब था, और दरिंदगी थी।


उसने डॉक्युमेंट पर साइन किए।


पहली खेप रवाना हुई।


*एक नया बंदरगाह मिला था उसे — खुद का।*


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**तेहरान, ईरान — शहजाद**


शहजाद आज अकेला था।


उसके बंकर में सन्नाटा था। उसके शागिर्दों में से कुछ जा चुके थे — प्रताप ने रिक्रूट किए, पाशा खुद निकल गया।


नौरोज़ — यही वो त्योहार था जिसे उसने कभी मनाना छोड़ दिया था। *"यह तो पुराना है, काफिरों का है"* — यही कहा था उसने।


पर आज बाहर से हफ्त सीन की खुशबू आ रही थी। पड़ोसियों ने सेब, सिक्के, सब्ज़े सजाए थे।


शहजाद खिड़की पर आया।


बाहर बच्चे दौड़ रहे थे। एक छोटी लड़की के हाथ में लाल सेब था।


उसे अचानक याद आई — अली की बचपन की एक तस्वीर। उसके हाथ में भी ऐसा ही सेब था। उस साल नौरोज़ था।


शहजाद की आँखें भर आईं।


उसने पहली बार सालों में अली को फोन किया।


घंटी बजती रही।


फिर उठी।


*"अब्बा?"*


शहजाद बोला — *"नौरोज़ मुबारक, बेटा।"*


दूसरी तरफ कुछ देर चुप्पी रही। फिर अली ने कहा:


*"आप पहली बार यह कह रहे हैं।"*


शहजाद ने कहा — *"हाँ। शायद देर से कह रहा हूँ।"*


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वसंत आया था।


वो धागा जो उस बंकर में गिलगामेश ने फेंका था — वो अब तुर्की से लाहौर तक, कराची से तेहरान तक फैला हुआ था।


प्रल्हाद ने रिक्रूटमेंट से लोगों को नई राह दी। प्रताप ने लाहौर में नई पीढ़ी को जोड़ा। पाशा ने कार्गो की पहली खेप रवाना की। गिलगामेश ने मदीना में पुराना इतिहास सहेजा। अली ने दुबई में नया सफर शुरू किया।


और शहजाद ने — पहली बार — एक पुराना त्योहार याद किया।


*कुछ टूटे हुए लोग, नई शुरुआत की तरफ — बस एक कदम।*


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**— जारी रहेगा**

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